Tuesday, February 17, 2009

कर्मचारियों के लिए एक विशेष सामग्री

हे पार्थ (कर्मचारी)

  • हृदेश अग्रवाल

इनक्रीमेंट अच्छा नहीं हुआ, बुरा हुआ
इनसेंटिव नहं मिला, ये भी बुरा हुआ...
वेतन में कटौती हो रही है बुरा हो रहा है....
तुम पिछले इनसेंटव ना मिलने का पश्चाताप ना करो,
तुम अगले इनसेंटिव की चिंता भी मत करो,
बस अपने वेतन में संतुष्ट रहो...
तुम्हारी जेब से क्या गया, जो रोते हो?
जो आया था सब यहीं से आया था...
तुम जब नहीं थे, तब भी ये कंपनी चल रही थी,
तुम जब नहीं होगे, तब भी चलेगी,
तुम कुछ भी लेकर यहां नहीं आए थे...
जो अनुभव मिला यहीं मिला...
जो भी काम किया वो कंपनी के लिए किया,
डिग्री लेकर आए थे, अनुभव लेकर जाओगे...
जो कम्प्यूटर आज तुम्हारा है,
यह कल किसी और का था...
कल किसी और का होगा और परसों किसी और का होगा...
तुम इसे अपना समझ कर क्यों मगन हो... क्यों खुश हो...
यही खुशी तुम्हारी समस्त परेशानियों का मूल कारण है...
क्यों तुम व्यर्थ चिंता करते हो, किससे व्यर्थ डरते हो,
कौन तुम्हें निकाल सकता है...?
सतत ‘नियम-परिवर्तन’ कंपनी का नियम है...
जिसे तुम ‘नियम-परिवर्तन’ कहते हो, वही तो चाल है...
एक पल में तुम बैस्ट परफॉर्मर और हीरो नंबर वन या सुपर स्टार हो जाते हो...
दूसरे पल में तुम वर्स्ट परफॉर्मर बन जाते हो और टारगेट अचीव नहीं कर पाते हो।
ऐप्रेजल, इनसेंटिव ये सब अपने मन से हटा दो,
अपने विचार से मिटा दो,
फिर कंपनी तुम्हारी है, और तुम कंपनी के...
ना ये इन्क्रीमेंट वगैरह तुम्हारे लिए है
ना तुम इसके लिए हो,परन्तु तुम्हारा जॉब सुरक्षित है
फिर तुम परेशान क्यों होते हो....?
तुम अपने आप को कंपनी को अर्पित कर दो,
मत करो इनक्रीमेंट की चिंता... बस मन लगाकर अपना कर्म किए जाओ
यही सबसे बड़ा गोल्डन रूल है
जो इस गोल्डर रूल को जानता है वो ही सुखी है...
वोह इन रिव्यू, इनसेंटिव, ऐप्रेजल, रिटायरमेंट आदि के बंधन से सदा के लिए हटा दो
तो तुम भी मुक्त होने का प्रयास करो और खुश रहो....


“Every sucessfu’’ person have a painfu’’ story so accept............

Sunday, February 15, 2009

भारत का दुर्भाग्य

भारत को आजाद हुए 6० वर्ष हो गए हैं, लेकिन सही मायने में आजादी तभी मिलेगी तब पूरे देश में बाल मजदूरी, रोजगार, शिक्षा, सड़क, पानी, दहेज के महिलाओ पर अत्याचार होना बंद हो जायेंगे और किसी भी प्रांत के छोटे-छोटे शहर, गांव में देखा जाए तो इन सभी चीजों की बहुत आवश्यकता है...
  • हृदेश अग्रवाल

आज़ादी के बाद न जानें कितने राजनैतिक दलों ने देश पर शासन किया पर आज भी छोटी-छोटी चीजों के लिए हमें आपस में लड़ता देखा गया है कभी जात-पात, to कभी धर्म के लिए भारत जैसे विशाल देश में सरकार् ने कोई नियम बनाया है कि बाल मजदूरी पर रोक लगाई जाए यह नियम सिर्फ नाम का ही है इस अमल कोई नहीं करता आज अपने देश की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि सभी राजनैतिक दल कहते हैं कि बच्चे देश का भविष्य है लेकिन सिर्फ भाषणवाजी में, हकीकत में तो यह बातें सिर्फ कितावों में ही अच्छी लगती हैं क्योकि सभी राजनैतिक दल किसी न किसी मुद्दे पर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर अपनी रोटी सेकते हैं, और जनता के सामने आते ही उनके हमदर्द बन जाते हैंआज हमारे देश में बाल मजदूरी एक बहुत बड़ा मुद्दा है और हम सभी नागरिकों पर श्राप है जो हम देखते हुए भी मूक बने हुए हैं हर नागरिक कहीं न कहीं रोजाना किसी बच्चों को नौकरी करते हुए देखता है, लेकिन इन दुकान उन दुकान मालिकों के खिलाफ कोई भी आवाज़ उठाने को तैयार नहीं है क्योकि हम इतने नीचे गिरते जा रहे हैं कि उन मासूम बच्चों को नहीं देख सकते हैं 10-12 साल की उम्र में ही अपनी पढ़ाई को छोड़कर काम में लग हुए हैं कुछ होटलों पर यही कोई 10-15 साल की उम्र के बच्चे काम कर हैं, दुकान मालिक उनसे कितना काम कराते हैं उसके मुकाबले तनख्वाह कुछ नहीं देते जरा सी गलती पर उनको अपशब्द बोलते हैं बाल मजदूरी की यह समस्या कोई सरकार या कोई पुलिस नहीं सुधार सकती अगर इसको सुधारना ही होगा तो हम सबको मिलकर, क्योकि हम यही सोचते रहते हैं कि पहले सरकार करे, पुलिस करे बाद में हम, लेकिन इसी सोच ने हम सबको अपनी नज़रों में नीचे गिरा दिया है अदालत ने एक आदेश पारित किया था कि बाल मजदूरी पर रोक लगाए जाए अगर किसी दुकान या मकान में कोई बच्चा मजदूरी करते हुए पकड़ा गया तो उसको जैन और जुरमाना भरना पड़ सकता है अभी हमारे देश में फिलहाल बच्चों पर आधारित कुछ धारावाहिक चल रहे हैं जैसे बालिका वधु, उतरन इन धारावाहिकों में भी बच्चे काम कर रहे हैं जिन पर भी प्रतिबंध लगना आवश्यक है बाल मजदूरी पर न्यायालय का कड़ा रूख छोटे व्यापारी या छोटे तबके के लोगों पर ही नहीं फिल्मी दुनिया पर भी लागू होना चाहिए, लेकिन देश की गरिमा समझी जाने वाली अदालत के इस आदेश को फिल्मी दुनिया सहित आम लोगों ने नकार दिया जो न्यायालय का अपमान है

दूसरा मुद्दा

कई जगह नहीं है शिक्षा

कई गावों में आज भी स्कूल के नाम पर एक कमरा है पर जहां पर पढ़ने वाला कोई नहीं है आज भी देश के ऐसे ही हालात हैं कई शहरों में सरकार व शिक्षा विभाग का कहना है कि छोटे से छोटे गावों में भी बच्चों को शिक्षा मिल रही है, लेकिन शिक्षा के नाम पर बच्चों को स्कूलों में कुछ नहीं मिल रहा क्योकि आज के प्राचार्य छोटी जगहों पर जाना अपनी तोहीन्न समझते हैं कि हम गावों में जाकर पढायेंगे बिल्कुल नहीं, जैसे तैसे अगर चलें जाते हैं तो शिक्षा विभाग में जाकर अपना तबादला शहरों में करवा लेते हैं ऐसे ही कई स्कूल ऐसे भी हैं जहां पर केवल नाम मात्र के ही बच्चे आते हैं क्योकि उनके मां-बाप का कहना है कि बच्चों को पढाये या दो वक्त की रोटी कमाएं, अगर बच्चों को पढ़ते हैं तो घर की स्थिति ठीक नहीं होने की वजह से दो वक्त की रोटी पाना मुश्किल है क्योकि हमारे पास इतना पैसा नहीं कि हम पढ़ा सकें, प्राइवेट स्कूलों के संचालक फीस के नाम पर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं, उन्हें नहीं मतलब कि क्या हो रहा है सरकार को चाहिए कि वह ऐसे स्कूलों की जांच के लिए एक कमेटी तैयार करे और दोषी पाए जाने पर स्कूल संचालकों पर उचित कार्यवाही कर सके सरकार नए-नए प्रावधान प्रतिदिन निकालती है पर इस पर अमल नहीं करती सरकार व संबंधित विभाग के मंत्री व sहिक्चा विभाग के सचिव को चाहिए कि वह एक बार सरकारी व अर्धसरकारी स्कूलों की रिपोर्ट भी देखना चाहिए जिससे कि स्कूलों के सही मायने में हालात मालूम सकें

तीसरा मुददा
सड़क के बिगड़ते हालत

प्रधानमंत्री सड़क योजनांतर्गत किसी भी गावों को शहरों से जोड़ा जाता है, लेकिन आज भी देश के विभिन्न प्रान्तों में कई शहर एवं गावों ऐसे हैं जो आज तक खस्ताहाल बने हुए हैं सड़कों पर गाड़ी चलाना मुश्किल ही नहीं पैदल निकलना भी मुश्किल है इसके साथ ही सरकारें दावा करती हैं कि हमने देश में, प्रांत में जितना विकास किया है उतना कोई दूसरी सरकार नहीं कर सकती सत्ता पक्ष विपक्ष पर आरोप लगाता है कि प्रदेश में सड़क की समस्या है लेकिन विपक्ष जब सत्ता में आता है तो कहता है कि हमारा प्रदेश हर क्षेत्र में सफल है खासकर सड़क में वही सत्ता पक्ष कुछ दिनो पहले तक विपक्ष पर आरोप लगा रहा था कि प्रदेश में सड़कें खस्ता हाल हैं, लेकिन वही सड़क फिर उनके लिए बहुत अच्छी हो जाती हैं सरकार यह क्यों भूल जाती है कि हमने कुछ दिनों पहले क्या कहा था ज्यादा होता है तो सड़क के नाम पर कुछ सड़कें बनवा दी जाती हैं बाकी सब अगले बजट सत्र के लिए रोक दी जाती हैं जैसे कि बजट खत्म हो गया हो, लेकिन यह सब तो एक बकवास है बजट अगर विकास में लगा देंगे तो मंत्रियों की तिजोरियां कैसे भरेंगी

चोथा मुद्दा

पानी की भी प्रदेश में बहुत ज्यादा किल्लत

प्रदेश में जहां देखो वहां पर सबसे बड़ी समस्या है तो वह पानी की है क्योकि कोई भी व्यक्ति रोटी के बिना रह सकता है पर बिना पानी के नहीं लेकिन सरकार का कहना है कि हम पूरी कोशिश कर रहें हैं अगर सूखा पड़ा तो कुछ मुआवजा देकर जनता को खामोश कर दिया जाए सरकार खुद ही विज्ञापन के द्वारा कहती है कि पानी है अनमोल, फिर क्योकि चुकाती है पानी का मोल

पाचवां मुद्दा

दहेज के लिए महिलाओं को प्रताड़ित करना

देश को आजाद हुए भले ही 60 वर्ष हो गए हैं, सरकार भले ही कहती हो कि हमारे देश में महिलाएं आज पिछड़ी हुई नहीं, बल्कि मर्दों के कन्धों से कंधा मिलाकर आगे निकल चुकी हैं, महिलाएं ही हैं जो चांद तक पहुंच चुकी हैं, लेकिन उसी देश में आज भी महिलाओं पर अत्याचार, दहेज के लिए प्रताड़ित करना, दलित महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार करना यह कहां की परंपरा है, इससे तो वह गुलामी का समय ही अच्छा था कम से कम औरतों पर अत्याचार हाेते थे, फिर भी महिलाएं अपने आप को महफूज समझती थीं आज के दौर में तो महिलाएं अपने आप को कुछ ज्यादा ही असुरक्षित महसूस करती हैं, क्योकि महिलाओं को इस बात का डर रहता है कि आजकल ज्यादातर जॉब के नाम पर महिलाओं से गलत काम करवए जाते हैं कुछ महिलाओं ने पूरी नारी जाती को बदनाम करके रख दिया हैहमारे देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हमारे भारत देश की प्रथम नागरिक खुद राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल हैं और भारत की महिलाओं के लिए उन्हें ऐसा कानून बनाना चाहिए जिससे कि महिलाएं अपने आपको पहले जैसा महफूज समझे, और किसी भी स्थान पर जा सकें हमारे देश में महिला संगठन बने हुए हैं कि महिलाओं के Dपर किए गए आत्याचारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हो सके और महिलाओं को आसानी से न्याय मिल सके कुछ नारियों को न्याय न मिलने की वह से उनके शासन एवं प्रशासन के प्रति आक्रोश है अभी हाल ही में एक और ताजा मामला देखने को आया जिसमें हरियाणा स्थित जिंद नामक जगह पर पुलिस विभाग के एक सब इंस्पेकटर ने एक लड़का-लड़की को सिर्फ इसलिए बुरी तरह् पीटा इतना ही नहीं उस लड़की को सरेआम सड़क पर बाल पकड़कर घसीटते हुए थाने तक लेकर गया और वहां पर खड़ी जनता ने उस पुलिस वाले या पुलिस विभाग का विरोध नहीं किया बल्कि मूक बने हुए तमाशा देखती रही वहीं सन 2008 में असम स्थित सीलिगुड़ी में देखने को मिला जिससे आदिवाशी महिलाओं को निवस्त्र कर सड़क पर पूरे नगर के सामने नंगा घुमाया गया, पुरूषों एवं पुलिस द्वारा उनको रोड पर घसीट कर मारा गया भारत में इस घिनोनी हरकत को मीडिया द्वारा दिखाया गया एवं भारत की जनता इस मूक होकर देखती रही लेकिन उन महिलाओं के प्रति किसी भी महिला संगठन, हिन्दू संगठन, सरकार या राष्ट्रपति द्वारा उन पुलिस आरोपियों के खिलाफ न तो कोई कार्यवाही हुई न ही उन्हें बर्खास्त किया गया यह है हमारे देश का कानून जो वास्तव में अंधा बना हुआ है जिसे हमारी सरकार नहीं देख सकती है

Friday, February 13, 2009

वैलेंटाइन डे परप्यार का इज़हार, उस पर बजरंग दल का प्रहार

  • हृदेश अग्रवाल

अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग

कोई प्रेम का पुजारी, कोई प्रेम के ख़िलाफ़




Thursday, February 12, 2009

संतों की वाणी

जिएं ऐसे की कल हो अंत, सिखें इतना की जीवन हो अनंत। दहेज मांगकर आप अपना सम्मान तो खोते ही हैं, साथ ही भिखारी होने का प्रमाण भी देते हैं।
क्रोध से मनुश्य दूसरों की बेइज्जती ही नहीं करता, बल्कि अपनी प्रतिश्ठा भी गंवाता है।
  • (सौजन्य से: लाला रामनारायण रामस्वरूप)

Monday, November 17, 2008

एक कार्यक्रम ऐसा भी

१६ नवम्बर को स्टार न्यूज़ के कार्यक्रम "कौन बनेगा मुख्यमंत्री "में
कहिये नेता जी का भोपाल से लाइव प्रसारण हुआ!जिसमे दो प्रमुख दलों के
नेता,समर्थक एवं जनता मौजूद थी !दोनों दलों के किन्ही दो दिग्गजों के साथ
जनता को सवाल-जवाब करने थे!बीजेपी की और से निवर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज
सिंह चौहान मौजूद थे!लेकिन हैरत तो तब हुयी जब कांग्रेस की तरफ़ से एक भी
नेता नही पंहुचा!कार्यक्रम के होस्ट दीपक चौरसिया ने कहा की कांग्रेस को
पहले ही कार्यक्रम की सूचना दे दी गई थी!मध्य प्रदेश कांग्रेस में
कमलनाथ,दिग्विजय सिंह,सुरेश पचौरी,,ज्योतिरादित्य सिंधिया और सत्यव्रत
चतुर्वेदी जैसे दिग्गज है,लेकिन इनमे से किसी ने इस कार्यक्रम में जनता
के बीच आने की हिम्मत नही दिखाई!इन दिग्गजों में या तो शिवराज सिंह और
जनता का सामना करने की ताकत नही है या फिर कांग्रेस में खीच तान जारी है
!सभी की नज़र मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है!मामला चाहे जो हो,लेकिन इस
कार्यक्रम में कांग्रेस नेताओं की अनुपस्थिति इस बात को उजागर करती है की
जनता का सामना करने की हिम्मत उनमे नही है!बहार मंच से हो हल्ला कैने में
ये नेता बहुत आगे है!कार्यक्रम के मंच से दीपक चौरसिया बार बार कह रहे थे
की जनता की बात सुनने को इन नेताओं के पास समय नही है,अभी यह हाल है तो
चुनाव जीतने के बाद क्या होगा?खैर कार्यक्रम जरुर ख़त्म हो गया लेकिन इन
गैर जिम्मेदार नेताओं को तो जनता अब वोटिंग के समय जवाब देगी!अब तो यही
कहना पड़ रहा है-
"अली कलि ही सो विन्ध्यौ,फिर आगे कौन हवाल.....


-कृष्ण कुमार द्विवेदी

Saturday, November 8, 2008

संसद में बंदर

हास्य व्यंग्य

संसद में बंदर
-राजेंद्र त्यागी


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संसद के अंदर बंदरों का जमघट देखा तो सवालों की श्रृंखला के साथ हमारे अंदर का पत्रकार जागा। हमने उनका साक्षात्कार करने की ठानी और अपनी ठान कंधे पर लाद संसद का दरवाज़ा जा खटखटाया। मुख्य द्वार से ही इक्का-दुक्का बंदरों से भेंट होनी शुरू हो गई। महानुभावों की श्रद्धा के साथ केलों का कलेवा कराते-कराते हम महात्मा गांधी की प्रतिमा के नज़दीक पहुँचे। प्रतिमा के तले ही महानुभावों का दरबार लगा था। नमन किया और केलों का शेष स्टॉक उनके सामने यों खोल कर रख दिया ज्यों प्रियतमा के सामने प्रेमी का आत्मसमर्पण। सभी महानुभाव केलों पर ऐसे टूटे जैसे मरे ढोर पर गिद्ध, मछलियों पर बगुला और कुर्सी पर नेता। प्रेम के साथ सभी ने केलों का कलेवा किया, अहसानवान थे हम श्रद्धावान। उनका बॉडीलैंग्वेज पढ़ हम आश्चर्यचकित थे, 'वर्षों से संसद में फिर भी अहसानवान। सोहबत का असर शायद रफ़्ता-रफ़्ता होता है' यह विचार कर हम शंका का समाधान खोज रहे थे। तभी युवा बंदर ने दाँतों पर चढ़ी होठों की परत उठाई और बोला, ''पत्रकार भी! चारा खाते हैं, ताबूत चबाते तोप गोले निगल जाते हैं। हमें केले खिलाने वालों के हाज़मे बड़े दुरुस्त होते हैं।''
युवा बंदर के कटाक्ष सुन कर सूरजमुखी-सा चेहरा गुड़हल-सा मुरझाया। हम कुछ कह पाते तभी हमारे थोबड़े पर उतर आई बारहखड़ी पढ़ उनका नेता सुखिया बोला, ''नादान है, शैतान है, सोहबत का असर है। इसकी बातों पर न जाना, माफ़ करना। उसे नहीं मालूम कि सभी इंसान चाराभक्षी नहीं हुआ करते।''
सुखिया की बात से हमारे ज्ञान में भी इज़ाफ़ा हुआ कि सभी बंदर बंदर नहीं हुआ करते जिस तरह सभी इंसान इंसान नहीं होते। ख़ैर, सुखिया के सामने हमने अपनी मंशा ज़ाहिर की। सुखिया ने कहा, ''पूछिए'' हमने पहला और सीधा सवाल किया, ''संसद में बंदर क्यों?''
सवाल सुखिया से किया था, जवाब चपल-चंचल बंटी ने दिया, ''अंदर वालों से वंशानुगत लक्षण काफ़ी मिलते हैं। दादा डार्विन का सिद्धांत सच लगता है।''
बंटी ने कटाक्ष किया या हक़ीक़त बयान की यह सोचते-सोचते हमारे चेहरे पर विस्मय बोधक व प्रश्न बोधक कई चिन्ह एक साथ उभर आए। बात फिर ज़हीन सुखिया ने सँभाली, ''बंटी कहता तो ठीक है, फिर भी अब सवाल यह नहीं है कि हम संसद में क्यों? सवाल अब यह है कि संसद से हमारा कूच क्यों?''
एक और विस्मय बोधक चिन्ह ने हमारे चेहरे पर कब्ज़ा जमाया और मुख से निकला, ''क्या! जा रहे हो?''
निराशा भाव के साथ सुखिया बोला, ''हाँ, बरखुरदार। अब यहाँ से जाना ही बेहतर है।''
''मगर क्यों? लंगूर के भय से?'' हमने पूछा। ''नहीं, नहीं! दरअसल हमें निराशा हाथ लगी। हम संसदीय मर्यादा सीखने आए थे। हमारा राजा उसे जंगल में लागू करने की इच्छा रखता था। मगर यहाँ तो. . . ।'' अपनी बात पूरी किए बिना ही सुखिया ने मुँह बंद कर लिया। शायद संसद की गरिमा का ख़याल रखते हुए।
''मगर, अभी तो आप वंशानुगत लक्षणों की बात कर रहे थे।'' हमारा अगला सवाल था।
हाँ, वंशानुगत लक्षण भी मिलते हैं और अंदर वालों ने हमारी 'खाऊ-फाड़ू, छीन-झपट नीति' भी अपनाई है। मगर लगता है, हमारी नीति को उन्होंने अपनी संस्कृति बना लिया है। सुखिया ने जवाब दिया। हमारी उत्सुकता ने पाँव पसारे और हमने पूछा, ''क्या मतलब?''
सुखिया बोला, ''नीति और संस्कृति में अंतर है। निति वक़्त-ज़रूरत पड़ने पर अपनाई जाती है और संस्कृति जीवन का अभिन्न अंग होती है। उनके व्यवहार से लगता है कि हमारी सुरक्षा नीति को उन्होंने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया है।''
सुखिया की बात सुन बंटी ने पूंछ हवा में लहराई और बोला, ''हाँ, हाँ! कभी-कभी तो ऐसा लगता है, मानो अंदर किसी ने गुड़ की भेली रख दी हो। बस डंडों की कमी रह जाती है। बड़ा मज़ा आता है, जब हो-हल्ला मचता है।''
''हाँ, भाई! ठीक कहता है, बंटी। झरोखों से झाँक कर देखते हैं, बड़ा ही वीभत्स नज़ारा होता है। उनकी मर्यादा उन्हें मुबारक। हमें अपने जंगल की शांति भंग नहीं करनी।'' सुखिया ने कमर खुजाई और उठ कर चल दिया। उसके पीछे-पीछे अन्य बंदर भी पंक्तिबद्ध हो लिए।
अंतिम सवाल के लिए हमने ''इलेक्ट्रानिक'' प्रयास किया और दौड़ कर माइक सुखिया के मुँह साथ भिड़ाते हुए बोले, ''अंतिम सवाल।''
''हाँ बोलो'' सुखिया रुका।
''आप तो श्रीराम के पुरातन भक्तों में से हैं और राम भक्तों से स्नेह करते हैं, फिर. . .?
''नो कमेंटस'' शायद, सवाल पूरा होने से पहले ही हमारी मंशा भांप गया था, इसीलिए नो कमेंटस कहा और लाव-लशकर के साथ चलता बना। 'हमारा अधूरा सवाल और सुखिया की नो कमेंटस' कूच करते-करते सुखिया संसद और राम दोनों की गरिमा का ख़याल रख गया।
16 मई 2007

Tuesday, November 4, 2008

दिमागी लंगडा राजा और लोकतंत्र

चुनाव आते ही सभी लोग अलग अलग दलों में अपना ठिकाना खोजने में लगे हुए है!चेहरे वाही पुराने बस पार्टी बदल गई,सिद्धांत बदल गए,नजरिया बदल गया,कल तक जो अपने थे आज वाही बेगाने है!खैर छोडिये राजनीती है सब जायज है,
वर्तमान में लोकतंत्र की दशा को व्यक्त करती एक कहानी याद आ गई सो उसे आप लोगों के सामने परोस रहा हूँ.
एक हंस-हंसिनी का बड़ा सुंदर जोड़ा था,दोनों में बड़ा प्रेम था!मजे से दिन कट रहे थे !एक दिन दोनों ने नीलगगन में सैर करने की सोची,दोनों सैर करते करते काफी दूर निकल गए!रात हो गई थी सोचा रात यही गुजार कर सुबह चलते है!एक बरगद का पेड़ दिखाई दिया,दोनों वहां पहुचे!उस बरगद के पेड़ पर एक उल्लू रहता था !हंस ने उल्लू से रात गुजारने की बात कही,उल्लू ने अनुमति दे दी!कहा कोई बात नही!सुबह जब हंस-हंसिनी उठ कर जाने लगे तब उल्लू ने हंसिनी को पकड़ लिया, कहा अब हंसीं मेरी है!हंस ने बड़ी विनती की लेकिन उल्लू नही माना,अब हंस ने राजा के दरबार में गुहार लगायी!राजा ने उल्लू को बुलाया,कहा उल्लू,हंसिनी हमेशा हंस की होती है,उल्लू की कभी नही हो सकती !ये जोड़ा बेमेल है!उल्लू ने कहा -हंसिनी मेरी है,यदि आपने ऐसा निर्णय नही दिया तो मै किले की प्राचीर पर बैठ कर आपके काले कारनामों का चिटठा खोल दूंगा !अब राजा डर गया!उसका निर्णय बदल गया,उसने कहा-हंस,अब हंसिनी उल्लू की है!तुम घर जाओ!हंस रोते हुए उदास मन से जाने लगा !अब उल्लू भी रो रहा था!हंस ने पूंछा-तुम क्यों रो रहे हो?मेरी हंसिनी मुझसे छीन गई है,मेरे रोने का कारण तो समझ में आता है,लेकिन तुम क्यों रो रहे हो?उल्लू बोला- में लोक तंत्र की दशा पर रो रहा हूँ,एक सिरफिरे के कारण राजा ने अपना निर्णय बदल दिया!एक धमकी से राजा ने अन्याय को जीता दिया!क्या होगा इस देश का?इसलिए में रो रहा हूँ!यही हाल है पूरे देश में,अब जनता को सोचना है अगली सरकार उन्हें कैसी बनानी है! जवाबों की आस में .......... कृष्ण कुमार द्विवेदी "किशन"