Thursday, August 19, 2010

बदल गए आजादी के मायने.....

बदल गए आजादी के मायने.....
आजादी के ६४ वां जश्न हमने जोर शोर से मनाया.....मगर १९४७ के बाद इन ६४ सालों में हम इतने स्वतंत्र हुए की कुछ भी करने लगे....यानी हमारे नसीब में स्वतानता तो आई मगर हमारे हाथों की लकीरों में स्वतंत्रता की रेखाए मिटना शुरू हो गई...हम सब अपने को स्वतंत्र भले ही बोले मगर सत्य यही है की हम मानसिक और वैचारिक रूप से अभी भी गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए है...हम जब इतिहास उठाकर देखते है या किसी विद्वान से पूछते है की हमारी गुलामी के लिए कौन जिम्मेदार था...तो जवाब मिलता है राजाओ की आपसी फूट......लेकिन मै मानता हू कि यहाँ कि जनता सबसे ज्यादा जिम्मेदार थी.....जो केवल मौन होकर सब देखती रही.....अगर १८५७ के बाद जैसी क्रांति और जनसैलाब उसी समय एकत्रित हो जाता...तो विश्व कि किसी भी शक्ति में इतनी कुव्वत नहीं थी कि हमें पराधीनता कि बेड़ियों में जकड लेता.....यदि हमारी जनता उसी समय जाग जाती तो शायद दुनिया के मानचित्र में भारत कि अलग ही तस्वीर होती....फिर शुरू हुआ संविधान में अपने मन मुताबिक परिवर्तन का खेल..कभी लिव इन रेलन्संशिप को मंजूरी दी गयी,तो कभी धरा ३७७ को...
स्वतंत्रता के इस जीवन में हम इतने स्वतंत्र हुए कि हम भूल गए कि जिस गरिमामयी पद पर किसी देश का राजा शासन करता है उस पर हमने निरक्षर,अनपढ़ ,भ्रष्ट को बैठा दिया.....राजधानी भोपाल में एक मामला भी ऐसा ही है...कल तक जिसके हाथ में पेंचकस और प्लस हुआ करता था...आज वे एक मीडिया संसथान में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को शिक्षित कर रहे है....और वह भी हिंदी जैसी भाषा?हिंदी जिसे हम मातृभाषा का दर्जा देते है उस मातृभाषा को वह व्यक्ति कैसे पढ़ायेगा....बात लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के भविष्य कि है.....अगर उस कोलेज में माइक और स्पीकर जोड़ने वाला व्यक्ति हिंदी पढ़ायेगा तो उन पत्रकारिता के छात्रो की दशा और दिशा का निर्धारण कैसे होगा?वे कितनी लम्बी रेस का घोडा बन पायेगे?ये कोई नहीं जनता....शायद वे भी नहीं!
विडंबना है ये कि एक बड़े ग्रुप के प्रशासनिक अधिकारी का खास होना उसके लिए वरदान साबित हुआ...और उसे बैक अप ऑफिस ब्यॉय से एक प्रवक्ता के रूप में प्रोन्नत कर दिया गया....क्या इस ग्रुप में और जगह नहीं थी क्या?जो उसे कहीं और समायोजित किया जाता...लेकिन बात थूक में सत्तू घोलने वाली है...कम खर्च में ज्यादा मुनाफा कमाने कि चाहत में,कोलेज प्रशासन ने पत्रकारिता के छत्रो का भविष्य अंधकार माय करने से भी परहेज नहीं किया....स्वतंत्रता है कोलेज प्रशासन को किसी को भी कहीं भी बैठने कि....
ऐसी ही जगहों पर स्वतंत्रता का दुरूपयोग किया गया....हम भूल गए कि जितनी स्वतंत्रता हमें है उतनी ही दूसरो को भी.....क्यों कि हमारी स्वतंत्रता वहां तक ख़त्म हो जाती है जहाँ दुसरे कि नाक शुरू होती है....
चार पंक्तियाँ....
जिनको नहीं था नोलेज,बस खोल दिया कोलेज
उनमे एक भट्टे वाला था,एक कट्टे वाला था,और एक चट्टे वाला था......

Saturday, April 17, 2010

जज्बे को सलाम

जज्बे को सलाम


जिंदगी संघर्षो का नाम है। इसी जिंदगी में कई बार ऐसे पडाव आते है , जहां सबकुछ रुका रुका सा लगता है । लेकिन यदि खुद में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, कुछ कर दिखाने का जुनून हो तो सारी परेषानी अपने आप ही दूर हो जाती है । सारी परेषानी उस साहस के आगे बौनी नजर आती है । ऐसी ही षख्सियत है भोपाल की क्षमा कुलश्रेष्ठ । जिसने 18 वर्ष की उम्र में एक्सीडेंट की त्रासदी झेली। रीढ की हड्डी टूटी , पैरो में एहसास का भाव नही रहा। लेकिन लगन थी काम की , विष्वास था खुद पर , आस्था थी ईष्वर पर । इसी का नतीजा है कि आज क्षमा न केवल बैठ सकती है बल्की चल भी सकती है। पेटिंग में नेषनल अवार्ड से सम्मानित हो चुकी क्षमा दुर्घटना से ग्रसित और अपाहिज बच्चो के लिए एक प्रेरणा श्रोत है। भोपाल के गोविंदपुरा में रहने वाले के.के कुलश्रेष्ठ आज एक रिटायर टीचर है। उनके पांच बच्चो में सबसे छोटी बेटी क्षमा बचपन से ही होनहार थी । उसने बचपन में पेंटिंग की कई प्रतियोगिताये जीतलेेकिन 1998 क्षमा के लिए अभिषाप बन कर आया ,और अचानक एक दिन छत से गिरने के कारण उसकी रीड की हड्डी क्षतिग्रस्त हो गई। पैरो की सम्वेदना भी खत्म हो गयी और डॉक्टरो ने भी जवाब दे दिया। लेकिन ये क्षमा का साहस और जज्बा ही था कि 55 से भी ज्यादा ऑपरेषन होने के बाद उसने हिम्मत नही हारी । अब वह न केवल बैठ सकती है , बल्कि सहारे के बल पर चल भी सकती है। अपनी इच्छा षक्ति के बल पर उसने न केवल येे कारनामा कर दिखाया बल्कि सारे दर्द भुलाकर उसने बु्रष ,रंगो और कलम का दामन थामा । बेनूर हो चुकी उसकी जिंदगी में रंगो के कारण फिर से रंगत आ गई। अभी तक क्षमा चित्रकारी के लिए करीब 100 पुरुष्कार जीत चुकी है ।दिल्ली में भारत सरकार द्वारा आयोजित सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने उसे निषक्त जनसषक्तीकरण के लिए पुरुष्कृत भी किया। स्वामी विवेकानंद की एक किताब ‘‘लेक्चर फ्रोम कोलंबो टू अलमोडा ‘‘ ने उसको जीवन जीने का सम्बल प्रदान किया। और उसने अपनी काबिलियत के दम पर खुद को साबित करके दिखया। अपनी गणेष पेंटिंग के कारण क्षमा ने लिम्का बुक रिकार्ड में भी अपना नाम दर्ज कराया। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अबदुल कलाम को अपना रोल मोडल मानने वाली क्षमा ने डॉक्टर कलाम के लिए ‘‘एक इंसान अग्नि के समान ‘‘ कविता भी लिखी। दिन भर अपने रंगो में खोई रहने वाली क्षमा कविता और कहानी भी लिखती है। हमारी एक गुजारिष पर उसने अपनी एक कविता भी सुनाई ।रंगो को अपना जीवन समर्पित कर चुकी क्षमा उन निसक्त लोगो के लिए प्रेरणा श्रोत्र है जो दुर्घटना के बाद षांत बैठ जाते है। अदभुत प्रतीभा की धनी क्षमा के लिए एक पंक्ति बिलकुल सटीक बैठती है ।
‘‘ अभी न पूछो कि मंजिल कहां है

अभी तो सफर का ईरादा किया

हैं न हारुगी मै होसला जिंदगी भर

किसी से नही खुद से वादा किया है।"

‘‘क्षमा नित नई नई उचाईयो को छुये और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में कामयाब हो । उसके इस जज्बे को हम सब सलाम करते हैं।

- कृष्ण कुमार द्विवेदी

Friday, March 5, 2010

लीक छोडती पत्रकारिता

चौथा स्तम्भ पत्रकारिता और इस पांचवे वेद का लेखक यानी वेद व्यास,एक पत्रकारलेकिन बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि वर्तमान कार्पोरेट जगत में पत्रकार एक बंधुआ मजदूर बन चुका है जो बड़े ओहदे पर बैठे लोग और मालिक कहेगा अब वही पांचवे वेद की ऋचाये होगी,श्लोक होंगे
अब पत्रकारिता,पत्रकारों से नहीं बड़े-बड़े उद्योगपतियों से है गाडी,चालक और मालिक का जो सम्बन्ध होता है,वही सम्बन्ध पत्रकारिता,पत्रकार और मालिक का होता हैवह जो कहेगा,पत्रकार वही लिखेगा और फिर गढ़ी जाती है पत्रकारिता की नई परिभाषा....
कभी मिशन के तहत शुरू हुआ ये शब्दजाल अब प्रोफेशन के रूप में पनपता जा रहा हैकभी लोकतंत्र के रक्षक के रूप में खड़ी नजर आने वाली पत्रकारिता अब लोकतंत्र को ही कमजोर करने का काम कर रही हैपिछले लोकसभा,विधानसभा,नगर निगम चुनावों में ये खूब देखा गया मतदाताओं का समर्थन हासिल ना कर पाने वाला एक धनाढ्य प्रत्याशी अपने पैसे की दम पर मीडिया का समर्थन ज़रूर हासिल कर लेता हैपैसे की दम पर कोई भी मुजरिम,बाहुबली अपने पक्ष में लिखवाता हैमीडिया भी विज्ञापन की लालच में उनका जोर-शोर से प्रचार प्रसार करता हैमीडिया द्वारा प्रचारित प्रोपेगंडा इस कदर फैलाया जाता है,कि मतदाता भी भ्रमित हो जाते हैं....
जिसके कारण एक स्वच्छ छवि का प्रत्याशी मुह की खाता है जबकि बाहुबली,अपराधी ,गुंडे सत्ता संभालते है बड़ी विडम्बना है कि जिस लोकतंत्र की स्थापना के लिए पत्रकारिता शुरू की गई थी उसी का दम घोंटने में ये अपना योगदान दे रही हैजिन प्रत्याशियों को दस या सौ वोट भी नहीं मिलते उनको भी हमारे समाचार पत्र,लोकप्रिय प्रत्याशी के नाम से संबोधित करते हैहालांकि मुंबई विधानसभा चुनावों में 'पैड न्यूज़' के मामले में अभी जांच चल रही हैहालिया मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक बड़े समाचार पत्र ने कांग्रेस प्रत्याशी का ऐसा विज्ञापन मुख्या पृष्ठ पर दिया लगा जैसे खबर लगी होइससे ज्यादा दूषित पत्रकारिता का नहीं हो सकता
कभी तो शर्मा आने लगती है,इसके वर्तमान पर तो इसके अतीत में झांकता हूँ तो सुखद अहसास का अनुभव होता है आज भी भारत की सवा सौ करोड़ जनता मीडिया के सामने प्यासे पपीहे की तरह ओस की बूंदों के लिए आशा भरी निगाहों से देख रही है की काश पत्रकारिता का चरित्र सुधर जाए और हमें सही खबर मिले
पत्रकारों के लिए
कलम के पहरुओं सजग पत्रकारों
स्याही से कागज़ पर जो कुछ उतारो
हो उसमें समय के विवादों की बातें
विवादों में उद्धृत हो गुमनाम रातें
अगर जागते हो कलम के सिपाही
तो संभव है रुक जाये थोड़ी तबाही
- कृष्ण कुमार द्विवेदी

Tuesday, February 23, 2010

२४ घंटे न्यूज़ चैनल के उद्भव के समय समाचार पत्र के बारे में तरह तरह के कयास लगाये गए कि समाचार पत्र अब जल्द ही पुराने ज़माने की पुरानी चीजे हो जायेगें,लेकिन इस बदलते परिवेश में भी समाचार पत्रों ने अपने अस्तित्व को बनाये रखा,नए नए आयामों को तय किया .......लेकिन शायद अब ये समाचार पत्र राजधानी के एक पत्रकारिता के शिक्षण संसथान में गुजरे ज़माने की पुरानी चीजे होने वाले है....विद्ध्यालय प्रबंधन के लिए ये अब पुराने सिक्कों से ज्यादा कुछ नहीं है.......पंजाब केसरी की सम्पादकीय जहाँ युवाओं में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की अलख जगाया करता है......तो जनसता के व्यंगात्मक लेख अपने आप में विशिष्ट है.....
सीधे तौर पर कहा जाये तो पत्रकारिता का ककहरा सीखने वाले छात्रो के लिए तो ये संजीवनी से कम नहीं....लेकिन पीपुल्स पत्रकारिता शिक्षण संसथान के छात्रों को अब ये समाचार पत्र पढने को नहीं मिलेगे......
विद्यालय प्रबंधन के एक निर्णय के अनुसार और मिली सुचना के अनुसार कॉलेज के लायब्रेरी में सारी मेग्जींस और राष्ट्रिय समाचार पत्र अब उपलब्ध नहीं हो पायेगे.....
लायब्रेरी में अब केवल दैनिक भास्कर,राज एक्सप्रेस,पत्रिका,और ग्रुप का पीपुल्स समाचार ही उपलब्ध रहेगा|
पता नहीं पत्रकारिता के इस संसथान में पत्रकारों के लिए इतनी मुट्ठी तंग क्यों की जा रही है......बदलते परिवेश और पत्रकारिता में हो रहे बदलावों से भावी पत्रकार कैसे रु ब रु हो पायेगे...
कॉलेज में न्यूज़ चैनल देखने के लिए और उसकी बारीकियों को सीखने के लिए कोमन रूम की व्यवस्था पहले से ही नहीं है...और अब समाचार पत्रों के बंद होने से पत्रकारिता के छात्र अपनी जिज्ञासा की प्यास कैसे बुझा पायेगे....
पत्रकारिता के छात्रों के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लग जायेगा....कैसी होगी इस कॉलेज की नई पौध ....ये तो कुछ कहा नहीं जा सकता...लेकिन ये बात बिलकुल तय है..कि मानव मूल्यों के सरोकार की पत्रकारिता को कर पायेगे ये छात्र.....इस संस्थान का तो भगवान ही मालिक है......
सभी छात्रों को उज्जवल भविष्य की शुभकामनाये.....

Monday, January 11, 2010

मेरा नज़रिया: नया साल,बढ़ते कदम

मेरा नज़रिया: नया साल,बढ़ते कदम

नया साल,बढ़ते कदम


नया साल,नई सौगातें,नया जोश और जज़्बा हर भारतीय की एक ख्वाहिश कि हमारा देश दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्की करे॥ भारतीय बाजार पटरी पर लौट रहा है मंडियां फिर से अपनी मुस्कान बिखेरने को तैयार और सेंसेक्स उचाइयों कि नई बुलंदियों को छूने की कोशिश कर रहा है....मतलब बड़ा साफ़ है नया साल नई खुशियाँ लेकर आया...लेकिन नहीं बदले तो नेताओं के चरित्र,साल की शुरुआत के साथ ही संवेदनहीनता की कई घटनाये..तमिलनाडु की एक घटना एक पुलिसकर्मी को हमला कर घायल कर दिया गया वह बेचारा लोगों से मदद की गुहार लगता रहा...मंत्री जी का काफिला वहीँ से गुजरा लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की....
एक दूसरी घटना...सतना में एक जिन्दा बच्चे को डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया..क्यों की डॉक्टर को जाने की जल्दी थी.....और किसी ने इस मामले को कवरेज नहीं दिया समय बदला,विकास हुआ...साथ में मर गई संवेदनशीलता.....
इसी तरह की जिन घटनाओं को तबज्जो नहीं दी जाती...हमारा प्रयास कि ऐसी घटनायों को उजागर करे....और इसी की एक कोशिश....हम सब मित्रों के सहयोग से जल्द ही भोपाल से एक मैगजीन का प्रकाशन...जो राजनैतिक मुद्दों पर आधारित होगी.....नाम होगा खबरमाला.....खबरों को एक माला में पिरोने का प्रयत्न..हमारा ध्येय खबर बनाना नहीं...ख़बरों को उजागर करना है....कोशिश पत्रकारिता के माप दंडों पर चलते हुए मानव मूल्यों की रक्षा की जा सके...
इस मैगजीन के सभी कार्यकर्ता नए हैं,नया जोश है......इसलिए कुछ नया करने की चाहत थी....सो बिना किसी दवाव के मानवीय पक्षों और उनकी आवाज को उठाया जा सके......
श्री प्रदीप तिवारी जी प्रधान सम्पादक का दायित्व निभा रहे है.......मेरे मित्र श्री राजा नगायच प्रबंध संपादक ही भूमिका में....और अजय चौहान मुख्या कार्य पालक संपादक की जिम्मेदारी निभा रहे है....
जल्द ही ये पत्रिका आप लोगो के हाथ में होगी...नए साल में हम लोगों के बढ़ते कदम ....बिना किसी दवाब के मानव मूल्यों की पत्रकारिता की कोशिश.....कैसा है हम लोगों का प्रयास ....क्या कमी रही पत्रिका में.......क्या हम अपनी पत्रिका में नया कर सकते है.....बस आपका प्यार और स्नेह चाहिए........
आपके प्यार के लिए अपेक्षित
कृष्ण कुमार द्विवेदी

Friday, July 3, 2009

" समलैंगिक सम्बन्ध " जोर से बोलो करंट नहीं लगेगा


अब वो दिन दूर नहीं जब पप्पू संग दीपू और मीनू संग सीमा की बारात आप के घरों के बगल से गुजरेगी| भई पहले सुना था पप्पू पास हो गया है लेकिन अब तो दीपू, मीनू, सीमा सभी पास हो गए हैं| अब वो एक दुसरे को फ्लाइंग किस्स देंगे और पुलिस केवल मूकदर्शक बनी देखती रहेगी| भई! अब कौन धारा 14 और 21 का उल्लंघन करे| किसी के निजी कार्य में दखल देने का किसी को अधिकार नहीं है|
बदलते ज़माने के साथ-साथ प्यार की परिभाषा भी बदल रही है| जुहू चौपाटी, विक्टोरिया पार्क में अब दो लड़के और दो लडकियां (माफ़ कीजियेगा वयस्क) इश्क लड़ायेंगे| और उनके मुह से निकलेगा " समलैंगिक सम्बन्ध " जरा जोर से बोलो करंट नहीं लगेगा|

बहुत हो गयी मजाक और मस्ती...

आप और हम सभी जानते हैं कि भारत संस्कृति का देश है|लेकिन आज हमारे देश को क्या हो गया है? ऐसा लग रहा है कि पाश्चात्य संस्कृति के भी कान काट लिए गए हों| चौंकिए मत, ये समाज में चंद लोगों कि वजह से ही हुआ है| बहस का मुद्दा धारा 377| है भी बहस का विषय| 149 साल के लम्बे इतिहास में जो पहले नहीं हुआ वो 2 जून, 2009 को हो गया| समलैंगिक सम्बन्ध को क्लीन चिट दे दी गयी|
अप्राकृतिक! जिसकी भगवान ने भी मंजूरी नहीं दी किसी को| समाज आज जिस चीज को सही नहीं मानता, उसी को रजामंदी दे दी गयी| माना कि सभी को समान हक मिलना चाहिए| इसका मतलब यह तो नहीं कि जो अमानवीय कृत्य कि श्रेणी में आता है उसे नजरअंदाज कर दिया जाये| तो फिर ऐसा क्यों? यह समाज में रह रहे उन लोगों कि मानसिकताओं के साथ बलात्कार है जो कि समलैंगिक सम्बन्ध को सही नहीं मानते|

जरा सोचिये कि आने वाली पीढी पर इसका क्या असर पड़ेगा? कल तक जिस कार्य को अपराध माना जाता था, आज वो अपराध कि श्रेणी में नहीं है| शायद हम ये नहीं जानते कि ऐसे सम्बन्ध को रजामंदी देने से एड्स जैसे खतरनाक बिमारी को न्योता दे रहे हैं|

-अभिषेक राय