Saturday, November 8, 2008

संसद में बंदर

हास्य व्यंग्य

संसद में बंदर
-राजेंद्र त्यागी


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संसद के अंदर बंदरों का जमघट देखा तो सवालों की श्रृंखला के साथ हमारे अंदर का पत्रकार जागा। हमने उनका साक्षात्कार करने की ठानी और अपनी ठान कंधे पर लाद संसद का दरवाज़ा जा खटखटाया। मुख्य द्वार से ही इक्का-दुक्का बंदरों से भेंट होनी शुरू हो गई। महानुभावों की श्रद्धा के साथ केलों का कलेवा कराते-कराते हम महात्मा गांधी की प्रतिमा के नज़दीक पहुँचे। प्रतिमा के तले ही महानुभावों का दरबार लगा था। नमन किया और केलों का शेष स्टॉक उनके सामने यों खोल कर रख दिया ज्यों प्रियतमा के सामने प्रेमी का आत्मसमर्पण। सभी महानुभाव केलों पर ऐसे टूटे जैसे मरे ढोर पर गिद्ध, मछलियों पर बगुला और कुर्सी पर नेता। प्रेम के साथ सभी ने केलों का कलेवा किया, अहसानवान थे हम श्रद्धावान। उनका बॉडीलैंग्वेज पढ़ हम आश्चर्यचकित थे, 'वर्षों से संसद में फिर भी अहसानवान। सोहबत का असर शायद रफ़्ता-रफ़्ता होता है' यह विचार कर हम शंका का समाधान खोज रहे थे। तभी युवा बंदर ने दाँतों पर चढ़ी होठों की परत उठाई और बोला, ''पत्रकार भी! चारा खाते हैं, ताबूत चबाते तोप गोले निगल जाते हैं। हमें केले खिलाने वालों के हाज़मे बड़े दुरुस्त होते हैं।''
युवा बंदर के कटाक्ष सुन कर सूरजमुखी-सा चेहरा गुड़हल-सा मुरझाया। हम कुछ कह पाते तभी हमारे थोबड़े पर उतर आई बारहखड़ी पढ़ उनका नेता सुखिया बोला, ''नादान है, शैतान है, सोहबत का असर है। इसकी बातों पर न जाना, माफ़ करना। उसे नहीं मालूम कि सभी इंसान चाराभक्षी नहीं हुआ करते।''
सुखिया की बात से हमारे ज्ञान में भी इज़ाफ़ा हुआ कि सभी बंदर बंदर नहीं हुआ करते जिस तरह सभी इंसान इंसान नहीं होते। ख़ैर, सुखिया के सामने हमने अपनी मंशा ज़ाहिर की। सुखिया ने कहा, ''पूछिए'' हमने पहला और सीधा सवाल किया, ''संसद में बंदर क्यों?''
सवाल सुखिया से किया था, जवाब चपल-चंचल बंटी ने दिया, ''अंदर वालों से वंशानुगत लक्षण काफ़ी मिलते हैं। दादा डार्विन का सिद्धांत सच लगता है।''
बंटी ने कटाक्ष किया या हक़ीक़त बयान की यह सोचते-सोचते हमारे चेहरे पर विस्मय बोधक व प्रश्न बोधक कई चिन्ह एक साथ उभर आए। बात फिर ज़हीन सुखिया ने सँभाली, ''बंटी कहता तो ठीक है, फिर भी अब सवाल यह नहीं है कि हम संसद में क्यों? सवाल अब यह है कि संसद से हमारा कूच क्यों?''
एक और विस्मय बोधक चिन्ह ने हमारे चेहरे पर कब्ज़ा जमाया और मुख से निकला, ''क्या! जा रहे हो?''
निराशा भाव के साथ सुखिया बोला, ''हाँ, बरखुरदार। अब यहाँ से जाना ही बेहतर है।''
''मगर क्यों? लंगूर के भय से?'' हमने पूछा। ''नहीं, नहीं! दरअसल हमें निराशा हाथ लगी। हम संसदीय मर्यादा सीखने आए थे। हमारा राजा उसे जंगल में लागू करने की इच्छा रखता था। मगर यहाँ तो. . . ।'' अपनी बात पूरी किए बिना ही सुखिया ने मुँह बंद कर लिया। शायद संसद की गरिमा का ख़याल रखते हुए।
''मगर, अभी तो आप वंशानुगत लक्षणों की बात कर रहे थे।'' हमारा अगला सवाल था।
हाँ, वंशानुगत लक्षण भी मिलते हैं और अंदर वालों ने हमारी 'खाऊ-फाड़ू, छीन-झपट नीति' भी अपनाई है। मगर लगता है, हमारी नीति को उन्होंने अपनी संस्कृति बना लिया है। सुखिया ने जवाब दिया। हमारी उत्सुकता ने पाँव पसारे और हमने पूछा, ''क्या मतलब?''
सुखिया बोला, ''नीति और संस्कृति में अंतर है। निति वक़्त-ज़रूरत पड़ने पर अपनाई जाती है और संस्कृति जीवन का अभिन्न अंग होती है। उनके व्यवहार से लगता है कि हमारी सुरक्षा नीति को उन्होंने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया है।''
सुखिया की बात सुन बंटी ने पूंछ हवा में लहराई और बोला, ''हाँ, हाँ! कभी-कभी तो ऐसा लगता है, मानो अंदर किसी ने गुड़ की भेली रख दी हो। बस डंडों की कमी रह जाती है। बड़ा मज़ा आता है, जब हो-हल्ला मचता है।''
''हाँ, भाई! ठीक कहता है, बंटी। झरोखों से झाँक कर देखते हैं, बड़ा ही वीभत्स नज़ारा होता है। उनकी मर्यादा उन्हें मुबारक। हमें अपने जंगल की शांति भंग नहीं करनी।'' सुखिया ने कमर खुजाई और उठ कर चल दिया। उसके पीछे-पीछे अन्य बंदर भी पंक्तिबद्ध हो लिए।
अंतिम सवाल के लिए हमने ''इलेक्ट्रानिक'' प्रयास किया और दौड़ कर माइक सुखिया के मुँह साथ भिड़ाते हुए बोले, ''अंतिम सवाल।''
''हाँ बोलो'' सुखिया रुका।
''आप तो श्रीराम के पुरातन भक्तों में से हैं और राम भक्तों से स्नेह करते हैं, फिर. . .?
''नो कमेंटस'' शायद, सवाल पूरा होने से पहले ही हमारी मंशा भांप गया था, इसीलिए नो कमेंटस कहा और लाव-लशकर के साथ चलता बना। 'हमारा अधूरा सवाल और सुखिया की नो कमेंटस' कूच करते-करते सुखिया संसद और राम दोनों की गरिमा का ख़याल रख गया।
16 मई 2007

Tuesday, November 4, 2008

दिमागी लंगडा राजा और लोकतंत्र

चुनाव आते ही सभी लोग अलग अलग दलों में अपना ठिकाना खोजने में लगे हुए है!चेहरे वाही पुराने बस पार्टी बदल गई,सिद्धांत बदल गए,नजरिया बदल गया,कल तक जो अपने थे आज वाही बेगाने है!खैर छोडिये राजनीती है सब जायज है,
वर्तमान में लोकतंत्र की दशा को व्यक्त करती एक कहानी याद आ गई सो उसे आप लोगों के सामने परोस रहा हूँ.
एक हंस-हंसिनी का बड़ा सुंदर जोड़ा था,दोनों में बड़ा प्रेम था!मजे से दिन कट रहे थे !एक दिन दोनों ने नीलगगन में सैर करने की सोची,दोनों सैर करते करते काफी दूर निकल गए!रात हो गई थी सोचा रात यही गुजार कर सुबह चलते है!एक बरगद का पेड़ दिखाई दिया,दोनों वहां पहुचे!उस बरगद के पेड़ पर एक उल्लू रहता था !हंस ने उल्लू से रात गुजारने की बात कही,उल्लू ने अनुमति दे दी!कहा कोई बात नही!सुबह जब हंस-हंसिनी उठ कर जाने लगे तब उल्लू ने हंसिनी को पकड़ लिया, कहा अब हंसीं मेरी है!हंस ने बड़ी विनती की लेकिन उल्लू नही माना,अब हंस ने राजा के दरबार में गुहार लगायी!राजा ने उल्लू को बुलाया,कहा उल्लू,हंसिनी हमेशा हंस की होती है,उल्लू की कभी नही हो सकती !ये जोड़ा बेमेल है!उल्लू ने कहा -हंसिनी मेरी है,यदि आपने ऐसा निर्णय नही दिया तो मै किले की प्राचीर पर बैठ कर आपके काले कारनामों का चिटठा खोल दूंगा !अब राजा डर गया!उसका निर्णय बदल गया,उसने कहा-हंस,अब हंसिनी उल्लू की है!तुम घर जाओ!हंस रोते हुए उदास मन से जाने लगा !अब उल्लू भी रो रहा था!हंस ने पूंछा-तुम क्यों रो रहे हो?मेरी हंसिनी मुझसे छीन गई है,मेरे रोने का कारण तो समझ में आता है,लेकिन तुम क्यों रो रहे हो?उल्लू बोला- में लोक तंत्र की दशा पर रो रहा हूँ,एक सिरफिरे के कारण राजा ने अपना निर्णय बदल दिया!एक धमकी से राजा ने अन्याय को जीता दिया!क्या होगा इस देश का?इसलिए में रो रहा हूँ!यही हाल है पूरे देश में,अब जनता को सोचना है अगली सरकार उन्हें कैसी बनानी है! जवाबों की आस में .......... कृष्ण कुमार द्विवेदी "किशन"

Monday, October 27, 2008

दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें


दीपावली की आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें

Tuesday, October 21, 2008

..........मगर सांवली सी

बहुत खुबसुरत मगर सांवली सी

मुझे अपने ख्वाबों की बाहों में पाकर
कभी नींद में मुस्कुराती तो होगी
उसी नींद में कसमसा-कसमसा कर
सिरहाने से तकिये गिराती तो होगी

वही ख्वाब दिन के मुंडेरों पे आके
उसे मन ही मन में लुभाते तो होंगे
कई साझ सीने की खामोशियों में
मेरी याद से झनझनाते तो होंगे
वो बेशाख्ता धीमें धीमें सुरों में
मेरी धुन में कुछ गुनगुनाती तो होगी

चलो खत लिखें जी में आता तो होगा
मगर उंगलियाँ कंपकपाती तो होगी
कलम हाथ से छुट जाता तो होगा
उमंगे कलम फिर उठाती तो होंगी
मेरा नाम अपनी किताबों पे लिखकर
वो दातों में उंगली दबाती तो होगी

जुबाँ से कभी अगर उफ् निकलती तो होगी
बदन धीमे धीमे सुलगता तो होगा
कहीं के कहीं पाँव पडते तो होंगे
जमीं पर दुपट्टा लटकता तो होगा
कभी सुबह को शाम कहती तो होगी
कभी रात को दिन बताती तो होगी

-अनाम

Monday, October 20, 2008

मनुष्य और कौवा

सैर करने गया मै
देखते ही देखते
चौराहे पर मर गया कौवा
कुचलकर किसी वाहन से
भीड़ इकट्ठी हो गई
हजारों कौवों की
कोलाहल हो गया
सारी सड़क पर
आगे कत्ल हो गया गली में
किसी इंसान का
देखते ही देखते
बंद हो गई सभी दुकानें
पता न लगा एक भी इन्सान का
सोचने लगा में भी,
क्या कीमत है इन्सान की
गायब हो जाते है
सभी मौत पर इन्सान की
गए सैर करने हम
राह नापते रहे
घर हमारा जल गया
लोग थे की दूर से तापते ही रहे !
-कृष्ण कुमार द्विवेदी

Saturday, October 18, 2008

प्रभु कितनों को कितनी बार माफ करेंगे!

प्रभु कितनों को कितनी बार माफ करेंगे!

-अनाम
जैसा कि हर शहर सिर्फ़ अपने निवासियों की नज़र में होता है अब तक रायपुर बेशर्म था सिर्फ़ रायपुर वालों के लिए। लेकिन इस घटना ने इसे अब राष्ट्रीय स्तर का बेशर्म बना दिया या कहें कि न केवल राष्ट्रीय स्तर बल्कि मानवता के स्तर पर भी। घटना इस तरह की पहले गुवाहाटी में भी हो चुकी है। गुवाहाटी की घटना का संदर्भ मुझे याद नही/मालूम नही। पर रायपुर की घटना का संदर्भ मुझे मालूम है।शहर के एक मोहल्ले के एक अपार्टमेंट में एक स्त्री अपने दुधमुंहे बच्चे और अपनी रिश्तेदार लड़कियों के साथ रहती है। स्त्री पहले पीटा एक्ट के तहत गिरफ्तार हो चुकी है पीटा एक्ट अर्थात ज़िस्मफरोशी का कारोबार। स्त्री का कथन है कि वह अब यह सब छोड़ चुकी है, मोहल्ले वालों का कहना है कि स्त्री के कारण मोहल्ले की आबो-हवा खराब होती जा रही है। वो ऐसे कि यह स्त्री अपने घर मे मौजूद अन्य दोनो लड़कियों/स्त्रियों के साथ बालकनी पर बैठकर आते-जाते लड़कों/पुरुषों को इशारेबाज़ी करती रहती हैं। मोहल्ले वालों के अनुसार उन लोगों ने इस बाबत कई बार पुलिस को खबर की लेकिन कोई कारवाई नही हुई।बताया जाता है कि एक अप्रैल की रात को भी ये महिलाएं अपनी बालकनी पर बैठकर नीचे सड़क पर आते-जाते लोगों को इशारेबाज़ी कर रही थीं। ऐसे ही एक युवक को इशारेबाज़ी कर उपर बुलाया गया। जब वह युवक उपर पहुंचा तो महिलाओंम और उनके साथी एक लड़के ने डरा-धमका कर उसे लूटना शुरु कर दिया गया। लड़के ने विरोध स्वरूप शोर मचाया और तब मोहल्ले वाले वहां पहुंचे।मोहल्ले वाले वहां पहुचें और उन्होने अपना खेल शुरु किया। मोहल्ले वालों का आक्रोश इतना ज्यादा था कि उन्होने इस महिला और उसके साथी पुरुष के साथ साथी महिलाओं को मारा-पीटा। इसके बाद अति यह हुई कि बचते हुए वह महिला नीचे सड़क पर आ गई, मोहल्ले के पुरुषों की आदिम प्रवृति ने उसका कुर्ता और अंदरूनी वस्त्र फाड़ डाले, महिला टॉपलेस हो कर अपने को बचाने रोती हुई सड़क पर भागती रही।मीडिया को खबर मिल चुकी थी,न्यूज़ फ्लैश होने लगा था,टीवी चैनल के कैमरे लग गए थे,लड़की टॉपलेस सड़क पर दौड़ती दिख रही थी, और दिख रही थी हम पुरुषों की आदिम प्रवृति टॉपलेस की गई सड़क पर दौड़ती एक ऐसी महिला के रूप में जो पहले कभी वेश्यावृति में संलग्न रही थी!!भीड़ का कोई तंत्र नही होता। नक्कारखाने मे तूती की आवाज़ का क्या असर होता है?ऐसे मौके पर किसी ने कपड़े फाड़े जाने का विरोध किया भी हो तो क्या किसी ने सुना होगा?पता नही मेरे पड़ोस में ऐसी महिलाएं रहने आए और उनकी ऐसी हरकतें जारी रहे बालकनी पर बैठकर इशारेबाज़ी करने वाली,तो मेरी क्या प्रतिक्रिया होगी तब। आप अपनी कहें………

ठीक-ठाक: कभी-कभी

ठीक-ठाक: कभी-कभी