मै बचपन से ही विचारक प्रवृत्ति का रहा हूँ...लेकिन अभी तक कोई माध्यम नही मिला जिससे कि दिल कि आवाज़ को लोगों तक पंहुचा सकूँ !लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के बाद विचारो को अभिव्यक्त करने का जज्बा भड़क उठा और लोगों से जुड़ने का अच्छा माध्यम लगा ब्लॉग और बना लिया विचारो को लिखने का आशियाना...
Monday, October 20, 2008
मनुष्य और कौवा
देखते ही देखते
चौराहे पर मर गया कौवा
कुचलकर किसी वाहन से
भीड़ इकट्ठी हो गई
हजारों कौवों की
कोलाहल हो गया
सारी सड़क पर
आगे कत्ल हो गया गली में
किसी इंसान का
देखते ही देखते
बंद हो गई सभी दुकानें
पता न लगा एक भी इन्सान का
सोचने लगा में भी,
क्या कीमत है इन्सान की
गायब हो जाते है
सभी मौत पर इन्सान की
गए सैर करने हम
राह नापते रहे
घर हमारा जल गया
लोग थे की दूर से तापते ही रहे !
-कृष्ण कुमार द्विवेदी
Saturday, October 18, 2008
प्रभु कितनों को कितनी बार माफ करेंगे!
प्रभु कितनों को कितनी बार माफ करेंगे!
-अनाम
जैसा कि हर शहर सिर्फ़ अपने निवासियों की नज़र में होता है अब तक रायपुर बेशर्म था सिर्फ़ रायपुर वालों के लिए। लेकिन इस घटना ने इसे अब राष्ट्रीय स्तर का बेशर्म बना दिया या कहें कि न केवल राष्ट्रीय स्तर बल्कि मानवता के स्तर पर भी। घटना इस तरह की पहले गुवाहाटी में भी हो चुकी है। गुवाहाटी की घटना का संदर्भ मुझे याद नही/मालूम नही। पर रायपुर की घटना का संदर्भ मुझे मालूम है।शहर के एक मोहल्ले के एक अपार्टमेंट में एक स्त्री अपने दुधमुंहे बच्चे और अपनी रिश्तेदार लड़कियों के साथ रहती है। स्त्री पहले पीटा एक्ट के तहत गिरफ्तार हो चुकी है पीटा एक्ट अर्थात ज़िस्मफरोशी का कारोबार। स्त्री का कथन है कि वह अब यह सब छोड़ चुकी है, मोहल्ले वालों का कहना है कि स्त्री के कारण मोहल्ले की आबो-हवा खराब होती जा रही है। वो ऐसे कि यह स्त्री अपने घर मे मौजूद अन्य दोनो लड़कियों/स्त्रियों के साथ बालकनी पर बैठकर आते-जाते लड़कों/पुरुषों को इशारेबाज़ी करती रहती हैं। मोहल्ले वालों के अनुसार उन लोगों ने इस बाबत कई बार पुलिस को खबर की लेकिन कोई कारवाई नही हुई।बताया जाता है कि एक अप्रैल की रात को भी ये महिलाएं अपनी बालकनी पर बैठकर नीचे सड़क पर आते-जाते लोगों को इशारेबाज़ी कर रही थीं। ऐसे ही एक युवक को इशारेबाज़ी कर उपर बुलाया गया। जब वह युवक उपर पहुंचा तो महिलाओंम और उनके साथी एक लड़के ने डरा-धमका कर उसे लूटना शुरु कर दिया गया। लड़के ने विरोध स्वरूप शोर मचाया और तब मोहल्ले वाले वहां पहुंचे।मोहल्ले वाले वहां पहुचें और उन्होने अपना खेल शुरु किया। मोहल्ले वालों का आक्रोश इतना ज्यादा था कि उन्होने इस महिला और उसके साथी पुरुष के साथ साथी महिलाओं को मारा-पीटा। इसके बाद अति यह हुई कि बचते हुए वह महिला नीचे सड़क पर आ गई, मोहल्ले के पुरुषों की आदिम प्रवृति ने उसका कुर्ता और अंदरूनी वस्त्र फाड़ डाले, महिला टॉपलेस हो कर अपने को बचाने रोती हुई सड़क पर भागती रही।मीडिया को खबर मिल चुकी थी,न्यूज़ फ्लैश होने लगा था,टीवी चैनल के कैमरे लग गए थे,लड़की टॉपलेस सड़क पर दौड़ती दिख रही थी, और दिख रही थी हम पुरुषों की आदिम प्रवृति टॉपलेस की गई सड़क पर दौड़ती एक ऐसी महिला के रूप में जो पहले कभी वेश्यावृति में संलग्न रही थी!!भीड़ का कोई तंत्र नही होता। नक्कारखाने मे तूती की आवाज़ का क्या असर होता है?ऐसे मौके पर किसी ने कपड़े फाड़े जाने का विरोध किया भी हो तो क्या किसी ने सुना होगा?पता नही मेरे पड़ोस में ऐसी महिलाएं रहने आए और उनकी ऐसी हरकतें जारी रहे बालकनी पर बैठकर इशारेबाज़ी करने वाली,तो मेरी क्या प्रतिक्रिया होगी तब। आप अपनी कहें………
दीपावली तेरा आना मंगलमय हो........
Friday, October 17, 2008
पूंजीवाद
-अनाम
बंदरवाला
हाथ नचा-नचाकर
बजाए जा रहा था डमरू
डिग-डिग, डम-डम
उछलता-कूदता, पीछे-पीछे
बच्चों का मस्तमौला झुंड !
दिखी अट्टालिका सामने
डाल दी पोटली
लगा जोर-जोर से बजाने
डिम-डिम डमरू
गाने लगा साथ-साथ
नाच मेरी बुलबुल..!
होने लगी
चवन्नी-अठन्नी की
पतझड़-सी बारिश
हनुमान जी समझकर
खिलाने लगे लोग बंदर को
केले-रोटी ।
भांति-भांति के करतब
दिखाए जा रहा था बंदर
बढ़ने लगी भीड़ धीरे-धीरे
एक क्षण के लिए रुका बंदर
पतली छड़ी पड़ी उस पर
सटाक…..!
बेचारे बंदर ने दृष्टि डाली
पहले अपने मालिक पर
फिर सिक्कों पर
नम हो गईं उसकी आंखें
शायद समझ गया था वह
पूंजीवाद का अर्थ..!
Thursday, October 16, 2008
दिल तो जनता के पास
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अष्टभुजा शुक्ल
एवरेस्ट पर खड़े होकर, परियार प्रदेश की ओर मुंह करके, दोनों हाथ उठाकर राम जाने कहा जा सकता है कि तुलसीदास हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी कवि हैं। इस तु... से लेकर हैं तक बनने वाले प्रत्याहार में निश्चित तौर पर तुलसी की उतनी लानत-मलामत भरी हुई है जितनी कि हिन्दी के किसी भी तथाकथित बुध्दिजीवी के लिए संभव है। कुछ क्षिप्र-ज्ञानियों के लिए तो तुलसी सिर्फ अवधी की सीमित बोली के कवि हैं। हिन्दी की व्यापकता के लिहाज से उनका मन, सोच, संवेदना और हृदय बहुत संकीर्ण है। विप्र-विरूध्द, शुद्र-अवमानना और स्त्री प्रतारणा इसके अकाटय प्रमाण हैं। बेशक, इस दृष्टि से तुलसी की आलोचना उचित है और होनी भी चाहिए। लेकिन तुलसी एक महान् कवि हैं इसलिए उनके पास भी अपने समय की तीखी आलोचना करने वाली व्यापक दृष्टि है। कलिकाल ही तुलसी का समकाल है। इसलिए 'कलि के कविन्ह करऊं परनामा' से शुरू होकर वे 'कलिकाल बेहाल भए मनुजा...' तक आर-पार देख पाते हैं। तुलसी तथाकथित साधु-संतों और तपस्वियों को न तो बख्शने वाले हैं और न ही गृहस्थों की दुर्दशा से आंख मूंद लेने वाले। इस कलि-कौतुक पर भी उनकी टिप्पणी गौरतलब है - तपसी धनवन्त दरिद्र गृही, कलि-कौतुक तात न जात कही। तो तात! तु शब्द से एक तौतातिक मत का ही निर्माण यहां हुआ है जिसकी चर्चा यहां व्यर्थ है।
सार्थक बात यह है कि तुलसी के लिए कलिकाल ही काल की एक अवधारणा है जिसका आंखों देखा हाल उन्होंने प्रसारित किया है। जिसे प्रज्ञाचक्षु भी देख सकते हैं। लेकिन सदा-सर्वदा जनसमाज बौध्दिक समाज से इत्तफाक नहीं रखता। बौध्दिक समाज जिस तरह सोचता है, जैसा पुलाव पकाता है, बिम्बों, प्रतीकों या मिथकों की जैसी व्याख्या करता है, जनसमाज कभी-कभी उसे सिर के बल खड़ा कर देता है और चीजों को अपने ही ढंग से बरतता है या 'डील' करता है। अपने गंवारूपन से भी वह आपके तीन-पांच को समझ लेता है। तुलसी लाख समझाते रह गए कि विभीषण ही लंका की नाक है, अपने राम का पक्का भक्त है, दांतों के बीच बिचारी जीभ जैसी उसकी दशा है, लंका के जिस राज को रावण दस बार अपने ही हाथों अपना गला काटकर पाया है उसे राम ने विभीषण को साभार प्रदान किया। अत: विभीषण को बहुत ही 'नीट एण्ड क्लीन' मानना चाहिए। पर जनता तुलसी की भी कोई दलील मानने को तैयार नहीं। वह विभीषण को अब भी 'घर का भेदिया, देशद्रोही या भ्रातृहंता' ही मानती है। जनकवि तुलसी विभीषण की छवि सुधारने की कोशिश में लगातार लगे रहे लेकिन 'मूढ़' जनता आज तक विभीषण को कटघरे में खड़ी करती रही। मैं सोचता हूं कि हिन्दुस्तान में असली दोगला कौन है? बुध्दिजीवी या जनता?
हिन्दुस्तान में हिन्दू लगातार असहिष्णु, बर्बर और हिंसक हुआ है। गुजरात नरसंहार की लोमहर्षक रपटें इसकी साक्ष्य हैं। ऐसी संगठित सांप्रदायिक हिंसा को कदापि जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन उन्माद के ऐसे ध्रुवीकरण से क्षुब्ध हिन्दू बुध्दिजीवियों को भी अपने गिरेबां में झांकने की फुर्सत नहीं। वे अपने जनविश्वासों की जितनी अनुदार भर्त्सना और थू-थू जैसे ताल ठोंक कर करते हैं, जितना आक्रामक होकर कुठाराघात करते हैं, वे जनता की सोच और कल्पनाओं से बेखबर अपनी राजनीति के शिकार अधिक होते हैं। यह विचारणीय है कि कहीं बुध्दिजीवियों के बड़बोलेपन की प्रतिक्रिया में भी तो समाज इतना कट्टर नहीं होता जा रहा है? तुलसी अगर कट्टर हिन्दू कवि हैं भी तो वे अन्य संप्रदायों के विरूध्द एक शब्द भी नहीं बोलते और अपने समकाल में नहीं बोलते। और बोलते हैं तो 'नहिं जानत हैं अनुजा-तनुजा' तक। ऐसी साफगोई कि दिल का एतबार क्या कीजै? हिन्दू बुध्दिजीवी खुद को ऐसे निरपेक्ष 'मनुष्य' के रूप में पेश करने को आतुर रहता है कि जनता उसके ढोंग से ऊब जाती है। इतना ही नहीं अपने विश्वासों पर अपनों द्वारा ही इतने तीखे हमलों से तिलमिलाकर भी उसके प्रतिहिंसक होने की संभावनाएं लगातार बनी रहती हैं। सांप्रदायिक विद्वेष को हवा देने वाली ताकतें ऐसी जनभावना को हर -हमेशा भुनाने की ताक में लगी रहती हैं और फौरी तौर पर अपने नापाक मनसूबों में कामयाब भी हो जाती हैं। शायद यही वजह है कि ऊपरी तौर पर तमाम चिल्ल-पों के बावजूद और सांप्रदायिक निर्मूलन के लिए हलकान दिखने वाले पहलवान कोई करामात दिखा पाने में असमर्थ सिध्द होते जा रहे हैं। आखिर सामाजिक सौहार्द्र क्यों कर इस तरह कम होता जा रहा है कि एक शांतिप्रिय समुदाय इतना उग्र और क्रूर नजर आने लगा है? कहीं हमारी नीयत में ही तो कोई खोट नहीं?
लेकिन आत्मालोचन भी एक बड़ा साहस है। अपनों और अपने समाज की रूढ़ियों और जड़ताओं को अनावृत करते जाने में भी बुध्दिजीवी की एक कारगर भूमिका होती है। तुलसी ने अपने समकाल में उन्हें पूरी शिद्दत के साथ प्रश्नांकित किया है। किंतु बहुत ही संयत ढंग से। लेकिन दिनकर जी ने ठीक ही कहा था -किंतु हाय। तप का वश चलता सदैव नहीं, पतित समूह की कुवृत्तियों के सामने। सामने अगर पतित समूह हो, नृशंस रूप से अमानुषिक और हिंसक हो तो सारा अनुनय- विनय अरण्यरोदन बनकर रह जाता है। ऐसी मनुष्यद्रोही शक्तियों का जमकर प्रतिरोध भी होना चाहिए और कटुतम प्रतिवाद भी। इस दृष्टि से हिन्दू बुध्दिजीवी मौजूदा परिदृश्य में साहसिक ही माने जाएंगे कि वे अपने समुदाय की धर्मान्धता पर और उसे हाईजैक करने की ताक में लगे कुटिल मनोरथों पर ताबड़तोड़ चोट कर रहे हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो गैर हिन्दू बुध्दिजीवी मजहब जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अक्सर बहुत ही लचीला रूप अख्तियार कर लेता है। एक खास एहतियात के साथ अपनी तकरीर पेश करता है ताकि लाठी भी न टूटे। उसके लिए महजब प्रमुख हो जाता है, बाकी चीजें गौण। खासतौर से हिन्दुस्तान के गैर हिन्दू बुध्दिजीवी मित्रों में ऐसी लाचारी अक्सर हां दिखती है। दीगर मुल्कों के रूश्दी, तस्लीमा, इस्मत आपा जैसे तरक्की पसंद लोग जैसे ही मजहब के घेरे से नुक्ता भर बाहर आते हैं, उनके सिर कलम करने के बख्शीश रख दिये जाते हैं। उनका सामाजिक बहिष्कार होता है, कातिलाना हमले होते हैं लेकिन हिन्दुस्तान के कौमी बुध्दिजीवियों का रूख अफसोसजनक रूप से बहुत ही ठंडा अथवा नपा-तुला होता है। उनके अल्फाजों में मजहब की भाप मिली रहती है। इस लिहाज से गौर करें तो पुराने भोपाल की बड़ी मस्जिद एक नायाब मिसाल है जिसके चौतरफा हिन्दुओं की दुकानें हैं और रहाइश मुसलमान भाइयों की और यह पहले ही कहा जा चुका है कि जन समाज सदा-सर्वदा बौध्दिक समाज से इत्तफाक नहीं रखता। वह अपनी ही तरह से जीता, सोचता और 'डील' करता है।
दरअसल जब बुध्दिजीवी भी नस्ली और मजहबी शुध्दता के प्रति बेहद ईमानदारी बरतता है तो सामान्य जनता भी उससे अपने फर्लांग कुछ और ही बढ़ा लेती है। आज जैसा आधुनिक विश्वसमाज बन रहा है, उसे देखते हुए जन्म शताब्दी वर्ष में हजारी प्रसाद द्विवेदी की ये पंक्तियां मील का पत्थर साबित होंगी - सब कुछ अविशुध्द है। शुध्द है तो केवल मनुष्य की जिजीविषा। संभवत: तुलसी भी उतने कट्टर हिन्दू और शुध्द ब्राह्मणवादी नहीं, जितना कि उन्हें सिध्द करने की प्रचेष्टा की जा रही है। उनके विद्रूपों पर कोई रबर न भी लगाया जाय तो भी वे पक्के और सच्चे जनकवि हैं। बुध्दिजीवी के पास दिमाग भले एवरेस्ट जितना ऊंचा हो, लेकिन दिल तो है दिल.... दिल जनता के पास होता है।
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अष्टभुजा शुक्ल
एवरेस्ट पर खड़े होकर, परियार प्रदेश की ओर मुंह करके, दोनों हाथ उठाकर राम जाने कहा जा सकता है कि तुलसीदास हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी कवि हैं। इस तु... से लेकर हैं तक बनने वाले प्रत्याहार में निश्चित तौर पर तुलसी की उतनी लानत-मलामत भरी हुई है जितनी कि हिन्दी के किसी भी तथाकथित बुध्दिजीवी के लिए संभव है। कुछ क्षिप्र-ज्ञानियों के लिए तो तुलसी सिर्फ अवधी की सीमित बोली के कवि हैं। हिन्दी की व्यापकता के लिहाज से उनका मन, सोच, संवेदना और हृदय बहुत संकीर्ण है। विप्र-विरूध्द, शुद्र-अवमानना और स्त्री प्रतारणा इसके अकाटय प्रमाण हैं। बेशक, इस दृष्टि से तुलसी की आलोचना उचित है और होनी भी चाहिए। लेकिन तुलसी एक महान् कवि हैं इसलिए उनके पास भी अपने समय की तीखी आलोचना करने वाली व्यापक दृष्टि है। कलिकाल ही तुलसी का समकाल है। इसलिए 'कलि के कविन्ह करऊं परनामा' से शुरू होकर वे 'कलिकाल बेहाल भए मनुजा...' तक आर-पार देख पाते हैं। तुलसी तथाकथित साधु-संतों और तपस्वियों को न तो बख्शने वाले हैं और न ही गृहस्थों की दुर्दशा से आंख मूंद लेने वाले। इस कलि-कौतुक पर भी उनकी टिप्पणी गौरतलब है - तपसी धनवन्त दरिद्र गृही, कलि-कौतुक तात न जात कही। तो तात! तु शब्द से एक तौतातिक मत का ही निर्माण यहां हुआ है जिसकी चर्चा यहां व्यर्थ है।
सार्थक बात यह है कि तुलसी के लिए कलिकाल ही काल की एक अवधारणा है जिसका आंखों देखा हाल उन्होंने प्रसारित किया है। जिसे प्रज्ञाचक्षु भी देख सकते हैं। लेकिन सदा-सर्वदा जनसमाज बौध्दिक समाज से इत्तफाक नहीं रखता। बौध्दिक समाज जिस तरह सोचता है, जैसा पुलाव पकाता है, बिम्बों, प्रतीकों या मिथकों की जैसी व्याख्या करता है, जनसमाज कभी-कभी उसे सिर के बल खड़ा कर देता है और चीजों को अपने ही ढंग से बरतता है या 'डील' करता है। अपने गंवारूपन से भी वह आपके तीन-पांच को समझ लेता है। तुलसी लाख समझाते रह गए कि विभीषण ही लंका की नाक है, अपने राम का पक्का भक्त है, दांतों के बीच बिचारी जीभ जैसी उसकी दशा है, लंका के जिस राज को रावण दस बार अपने ही हाथों अपना गला काटकर पाया है उसे राम ने विभीषण को साभार प्रदान किया। अत: विभीषण को बहुत ही 'नीट एण्ड क्लीन' मानना चाहिए। पर जनता तुलसी की भी कोई दलील मानने को तैयार नहीं। वह विभीषण को अब भी 'घर का भेदिया, देशद्रोही या भ्रातृहंता' ही मानती है। जनकवि तुलसी विभीषण की छवि सुधारने की कोशिश में लगातार लगे रहे लेकिन 'मूढ़' जनता आज तक विभीषण को कटघरे में खड़ी करती रही। मैं सोचता हूं कि हिन्दुस्तान में असली दोगला कौन है? बुध्दिजीवी या जनता?
हिन्दुस्तान में हिन्दू लगातार असहिष्णु, बर्बर और हिंसक हुआ है। गुजरात नरसंहार की लोमहर्षक रपटें इसकी साक्ष्य हैं। ऐसी संगठित सांप्रदायिक हिंसा को कदापि जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन उन्माद के ऐसे ध्रुवीकरण से क्षुब्ध हिन्दू बुध्दिजीवियों को भी अपने गिरेबां में झांकने की फुर्सत नहीं। वे अपने जनविश्वासों की जितनी अनुदार भर्त्सना और थू-थू जैसे ताल ठोंक कर करते हैं, जितना आक्रामक होकर कुठाराघात करते हैं, वे जनता की सोच और कल्पनाओं से बेखबर अपनी राजनीति के शिकार अधिक होते हैं। यह विचारणीय है कि कहीं बुध्दिजीवियों के बड़बोलेपन की प्रतिक्रिया में भी तो समाज इतना कट्टर नहीं होता जा रहा है? तुलसी अगर कट्टर हिन्दू कवि हैं भी तो वे अन्य संप्रदायों के विरूध्द एक शब्द भी नहीं बोलते और अपने समकाल में नहीं बोलते। और बोलते हैं तो 'नहिं जानत हैं अनुजा-तनुजा' तक। ऐसी साफगोई कि दिल का एतबार क्या कीजै? हिन्दू बुध्दिजीवी खुद को ऐसे निरपेक्ष 'मनुष्य' के रूप में पेश करने को आतुर रहता है कि जनता उसके ढोंग से ऊब जाती है। इतना ही नहीं अपने विश्वासों पर अपनों द्वारा ही इतने तीखे हमलों से तिलमिलाकर भी उसके प्रतिहिंसक होने की संभावनाएं लगातार बनी रहती हैं। सांप्रदायिक विद्वेष को हवा देने वाली ताकतें ऐसी जनभावना को हर -हमेशा भुनाने की ताक में लगी रहती हैं और फौरी तौर पर अपने नापाक मनसूबों में कामयाब भी हो जाती हैं। शायद यही वजह है कि ऊपरी तौर पर तमाम चिल्ल-पों के बावजूद और सांप्रदायिक निर्मूलन के लिए हलकान दिखने वाले पहलवान कोई करामात दिखा पाने में असमर्थ सिध्द होते जा रहे हैं। आखिर सामाजिक सौहार्द्र क्यों कर इस तरह कम होता जा रहा है कि एक शांतिप्रिय समुदाय इतना उग्र और क्रूर नजर आने लगा है? कहीं हमारी नीयत में ही तो कोई खोट नहीं?
लेकिन आत्मालोचन भी एक बड़ा साहस है। अपनों और अपने समाज की रूढ़ियों और जड़ताओं को अनावृत करते जाने में भी बुध्दिजीवी की एक कारगर भूमिका होती है। तुलसी ने अपने समकाल में उन्हें पूरी शिद्दत के साथ प्रश्नांकित किया है। किंतु बहुत ही संयत ढंग से। लेकिन दिनकर जी ने ठीक ही कहा था -किंतु हाय। तप का वश चलता सदैव नहीं, पतित समूह की कुवृत्तियों के सामने। सामने अगर पतित समूह हो, नृशंस रूप से अमानुषिक और हिंसक हो तो सारा अनुनय- विनय अरण्यरोदन बनकर रह जाता है। ऐसी मनुष्यद्रोही शक्तियों का जमकर प्रतिरोध भी होना चाहिए और कटुतम प्रतिवाद भी। इस दृष्टि से हिन्दू बुध्दिजीवी मौजूदा परिदृश्य में साहसिक ही माने जाएंगे कि वे अपने समुदाय की धर्मान्धता पर और उसे हाईजैक करने की ताक में लगे कुटिल मनोरथों पर ताबड़तोड़ चोट कर रहे हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो गैर हिन्दू बुध्दिजीवी मजहब जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अक्सर बहुत ही लचीला रूप अख्तियार कर लेता है। एक खास एहतियात के साथ अपनी तकरीर पेश करता है ताकि लाठी भी न टूटे। उसके लिए महजब प्रमुख हो जाता है, बाकी चीजें गौण। खासतौर से हिन्दुस्तान के गैर हिन्दू बुध्दिजीवी मित्रों में ऐसी लाचारी अक्सर हां दिखती है। दीगर मुल्कों के रूश्दी, तस्लीमा, इस्मत आपा जैसे तरक्की पसंद लोग जैसे ही मजहब के घेरे से नुक्ता भर बाहर आते हैं, उनके सिर कलम करने के बख्शीश रख दिये जाते हैं। उनका सामाजिक बहिष्कार होता है, कातिलाना हमले होते हैं लेकिन हिन्दुस्तान के कौमी बुध्दिजीवियों का रूख अफसोसजनक रूप से बहुत ही ठंडा अथवा नपा-तुला होता है। उनके अल्फाजों में मजहब की भाप मिली रहती है। इस लिहाज से गौर करें तो पुराने भोपाल की बड़ी मस्जिद एक नायाब मिसाल है जिसके चौतरफा हिन्दुओं की दुकानें हैं और रहाइश मुसलमान भाइयों की और यह पहले ही कहा जा चुका है कि जन समाज सदा-सर्वदा बौध्दिक समाज से इत्तफाक नहीं रखता। वह अपनी ही तरह से जीता, सोचता और 'डील' करता है।
दरअसल जब बुध्दिजीवी भी नस्ली और मजहबी शुध्दता के प्रति बेहद ईमानदारी बरतता है तो सामान्य जनता भी उससे अपने फर्लांग कुछ और ही बढ़ा लेती है। आज जैसा आधुनिक विश्वसमाज बन रहा है, उसे देखते हुए जन्म शताब्दी वर्ष में हजारी प्रसाद द्विवेदी की ये पंक्तियां मील का पत्थर साबित होंगी - सब कुछ अविशुध्द है। शुध्द है तो केवल मनुष्य की जिजीविषा। संभवत: तुलसी भी उतने कट्टर हिन्दू और शुध्द ब्राह्मणवादी नहीं, जितना कि उन्हें सिध्द करने की प्रचेष्टा की जा रही है। उनके विद्रूपों पर कोई रबर न भी लगाया जाय तो भी वे पक्के और सच्चे जनकवि हैं। बुध्दिजीवी के पास दिमाग भले एवरेस्ट जितना ऊंचा हो, लेकिन दिल तो है दिल.... दिल जनता के पास होता है।