Thursday, February 24, 2011

वह तोड़ता पत्थर...

उत्तर प्रदेश का सबसे छोटा और पिछड़े जिला में शुमार,आल्हा ऊदल की नगरी के नाम से ख्याति प्राप्त,वीर भूमि वसुंधरा के नाम से उद्बोधित..पानों का नगर..महोबा अपने में कई ऐतिहासिक तथ्यों को अपने में लीन किये है...बुंदेलखंड क्षेत्र से सबसे ज्यादा मंत्री होने के बावजूद ये जिला अपने काया कल्प और विकास के लिए आज भी सरकारी बाट जोह रहा है...पता नहीं कब तस्वीर बदलेगी..इस क्षेत्र की..यहाँ के नुमाइंदों की...खैर आज राजनैतिक बातें नहीं...मुद्दे की बात..
जिसने लोगों की सेवा में लगा दिया अपना बचपन .. जिले से राज्य और फिर राष्ट्र स्तर के बटोरे ढेरों पुरस्कार....जिस पर राष्ट्रपति भी हो गए निहाल..और दिया राष्ट्रपति सम्मान..जो बना युवाओं का आदर्श...मगर अफ़सोस कि वो मुफलिसी से हार गया..पेट की भूंख और रिश्तों के निर्वहन के दायित्व ने उसे तोड़ कर रख दिया..विधवा मां की बीमारी और तंगहाली से जूझने की राह ढूंढने में नाकाम हो गया वो.. लेकिन अभी भी उसमे हौसला है..उसको है अपनी जिम्मेदारियों का एहसास...जिसके लिए वो गिट्टी तोड़ने में हाड़तोड़ मेहनत कर वह अपनी पढ़ाई भी करता है और बीमार मां व बहन की परवरिश भी... मां के इलाज व बहन की शादी के लिये पैसे से लाचार ये कर्मवीर अब इस उधेड़बुन में है कि किसी तरह बहन के हाथ पीले करे..
इस कर्म योद्धा की कहानी सुनकर मुझे एक गीत कि पंक्तियाँ याद आती हैं...
बचपन हर गम से बेगाना होता है...
मगर कबरई कस्बे के राजेंद्र नगर के निवासी 17 साल के श्यामबाबू को नहीं पता कि बचपन क्या होता है...इसके होश संभालने के पहले पिता का साया इसके ऊपर से उठ चुका था..जिस उम्र में इसे अपने हम उम्र साथियों के साथ खेलना चाहिए था..उस समय इसके हाथ अपने परिवार को पालने के लिए हथौड़ा चलाते लगे... जब इसको अपना जीवन संवारना चाहिए तो इसे अपनों की रुश्वाइयों का शिकार होना पड़ा....बड़े भाई ने बीमार मां व छोटे भाई बहनों को छोड़ अपनी अलग दुनिया बसा ली...न रहने को मकान था और न एक इंच जमीन, कोई रोजगार भी नहीं.. इन कठिन हालात में इस कर्मवीर ने कस्बे के पत्थर खदानों में हाड़तोड़ मेहनत कर स्वयं मां व छोटे भाई बहनों की रोटी तलाश की...समाजसेवा का जज्बा होने के कारण अध्ययन के दौरान विविध गतिविधियों में हिस्सा ले खुद को तपाया...स्काउट गाइड, रेडक्रास सोसायटी, राष्ट्रीय अंधत्व निवारण कार्यक्रम, राजीव गांधी अक्षय ऊर्जा कार्यक्रम जैसे तमाम आयोजनों में इस मेधा को प्रशिस्त पत्र दे सम्मानित किया गया...सम्मान और पुरस्कारों का क्रम जिले से शुरू हो राज्य और राष्ट्र स्तर तक पहुंचा...12 साल की उम्र में राज्यपाल टीवी राजेश्वर और 14 जुलाई 10 को राष्ट्रपति ने स्काउट गाइड के रूप में बेहतर सेवा के लिये इसे सम्मानित किया.... राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित यह किशोर अभी भी पत्थर खदानों में मजदूरी कर रहा है... बीमार मां के इलाज और सयानी बहन की शादी कैसे हो यह सवाल उसे खाये जा रहा है...हर पल उसे चिंता की आग में जला रहा है... जिले का गौरव बढ़ाने वाले इस किशोर के पास रहने को झोपड़ी तक नहीं...अब तक नाना नानी के घर में शरणार्थी की तरह रहने वाले इस परिवार को अब वहां भी आश्रय नहीं मिल पा रहा है... जिले से राष्ट्रीय स्तर तक तमाम प्रतियोगिताएं जीत चुका यह किशोर असल जिंदगी की प्रतियोगिता का मुकाम हासिल नहीं कर पा रहा है.. शादी योग्य बहन के हाथ पीले न कर पाने की लाचारी में वह इसे देख निगाहें झुका लेने को मजबूर है..राज्य स्तर के ढेरों पुरस्कारों व स्काउट गाइड में राष्ट्रपति से सम्मानित श्यामबाबू को किसी सरकारी योजना में शामिल नहीं किया गया... इसके पास न रहने को घर है न एक इंच भूमि... परिवार में कोई कमाने वाला भी नहीं... हद यह कि इस परिवार को गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन का कार्ड भी हासिल नहीं हुआ... प्रशासन चाहता तो कांशीराम आवास योजना के तहत इसे छत तो दे ही सकता था पर वह भी नसीब नहीं हुई... इंदिरा और महामाया आवास भी नहीं मिले... हालात से जाहिर है जिले में ऐसे जरूरतमंद उंगलियों में गिनने लायक ही होंगे.... लेकिन ऐसे इन्हीं लोगों को जब छत और रोजगार न मयस्सर हो तो फिर सरकारी योजनाओं का लाभ किसे दिया जा रहा है....अपने आप में एक बड़ा सवाल है....
प्रतिभा तोडती पत्थर या पत्थरों से टूटती प्रतिभा इसे क्या कहा जाए..आप खुद सोचिये..

Thursday, February 17, 2011

हम उपभोक्ता नहीं निर्माता हैं...

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना,गिरकर चड़ना न अखरता है
.......
हरिवंशराय बच्चन की ये पंक्तियाँ बरबस ही याद आ गई...
राजधानी भोपाल के पास एक ग्राम पंचायत कुकरीपुरा का गाँव त्रिवेणी...जिसमे लोगों की मदद और सरकारी योजना के चलते बिजली से जगमग हो गया...एक ओर जहाँ राज्य सरकार केंद्र सरकार पर कोयला न देने का आरोप लगा रही है...और बिजली की कमी का रोना रो रही है....तो दूसरी ओर ग्रामीणों का सकारात्मक प्रयास से गाँव बिजली से रोशन हो गया...वहीँ त्रिवेणी के आसपास के गाँव अँधेरे में डूबे रहते है....करीब छह सौ की आबादी वाला ये गाँव जिसमे आधे से ज्यादा घरों के शौचालयों के टैंक सीवर लाइन से जोड़े गए...और फिर केंद्र सरकार की ग्रामीण स्वच्छता योजना के तहत इस मल से बायो गैस के ज़रिये बिजली उत्पादन किया जा रहा है...करीब ५ मेगावाट बिजली उत्पादित हो रही है इस गाँव में...गाँव के लोग अब बिजली के लिए अँधेरे में एक दूसरे का मुंह नहीं तकते हैं...बल्कि इस बिजली से गलियों में ट्यूब लाईट जलाई जाती है...किसी की शादी विवाह में भी रोशनी के लिए इसका उपयोग किया जा रहा है...सामुदायिक भवन भी रोशन हो रहा है...गाँव वालों का कहना है कि अभी जब पूरे घरों के सीवर टैंक इससे जुड़ जायेगे तो उत्पादन और बढ़ जायेगा..अब ग्रामीण न केवल टेलीवीजन चलाते हैं बल्कि एफ.एम. का आनंद भी लेते है....खैर...मेहनत तो रंग लाती ही है...बस जरूरी होता है ज़ज्बा..जोश..जूनून...और काम के प्रति लगन...
आप मेरी तकदीर क्या लिखेगें दादू?वो मेरी तकदीर है..जिसका नाम है विधाता....संजय दत्त का ये डायलोग विधाता फिल्म का याद आ गया....इस गाँव को देख कर क्या कहू...समझ नहीं आ रहा है...इतना खुश हूँ कि गाँव में रहने वाले दीन हीन लोग भी अब अपनी तरक्की के लिए आगे आ रहे हैं...और अपने विकास की इबारत भी खुद ही लिख रहे हैं....बस यही ज़ज्बा सब में आ जाये तो हिंदुस्तान को विकसित राष्ट्र बनने में ज्यादा समय नहीं लगेगा....

Wednesday, February 16, 2011

हर्ष ने दिया दुःख

दुश्मनों ने तो ज़ख्म देने ही थे, ये उनकी फितरत थी,

दोस्तों ने भी जब दगा की, यह हमारी किस्मत थी!

कल शाम जब मेरे एक मित्र का सन्देश मेरे मोबाइल पर आया...तब अनायास ही ये शब्द लिख कर भेजे थे मैंने उसे...अचानक ही निकला था मेरे मन से ये शेर...नहीं जानता था कि आज मेरे अपने ही मुझे जुदाई का गम देने वाले हैं....समझ नहीं पा रहा हूँ कि इस साल कि शुरुवात में हमसे क्या गलती हुई...कि ये नीली चादर वाला भी मेरे हांथो की मजबूती जो मेरे मिरता हैं..एक एक कर छीनता जा रहा है...जनवरी के महीने में मनेन्द्र....और अब मेरे जीवन से यमराज हर्ष भी छीन कर ले गया...बड़ा प्यारा था वो...एक दम गोल मटोल गोलू की तरह...सम्मान में झुकता तो ऐसे था लगता था अगर हाथ नहीं रखा तो वही स्थिति बना कर रखेगा...मेरी चौथी पीढ़ी का सदस्य था वो....ज्यादा तो मुलाकात नहीं हुई...मगर जितनी भी बार हुई...दिल जीत लिया था उसने...मगर ऊपर वाले को कुछ और ही मंजूर था....

पीपुल्स पत्रकारिता शिक्षण संस्थान का बी.एस.सी प्रथम वर्ष के दो छात्र हर्ष शर्मा और प्रकाश पांडे...जो भोपाल में अयोध्या बाय पास रोड से कॉलेज की ओर आ रहे थे...अचानक एक ट्रक से हुई टक्कर से हर्ष की जिंदगी की रफ़्तार मौके पर ही रुक गई...जबकि प्रकाश अभी भी जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है...दुर्घटना इतनी भयावह थी कि प्रकाश के शरीर से मांस के लोथड़े निकल गए..कल कि ही बात है एक सोशल साईट पर मेरे पास मित्रता के लिए अर्जी भेजी थी....शाम को जब हर्ष के पिता उसे देखने आये...तो बेटे का चेहरा देखने की ताक़त उनमे नहीं थी...आँख से आंसू का एक भी कतरा नहीं गिरा...पर दिल बहुत रोया....पता नहीं मेरे मित्रों को किसकी नज़र लग गई...सवाल कॉलेज पर उठता है कि जब कॉलेज का समय १० बजे से शाम ५ तक है...तो ३.३० बजे ये छात्र बाहर कैसे निकले....खैर होनी को कौन टाल सकता है...मौत कोई न कोई बहाना लेकर आती है...कल जब हर्ष से मेरे मित्रों ने कहा कि बाइक के ब्रेक ठीक करा लेना...तो जानते हो क्या जवाब था उसका...भैया मौत ही तो होगी...इससे ज्यादा क्या...और सच कर दिया उसकी बात को ईश्वर ने...लोगों ने डांटा भी...ऐसा नहीं कहते...लेकिन गर्म खून कब शांत होता है...और पत्रकारिता जगत का एक और नाविक बिना नाव को खेये चला गया...मैं अब भी इस घटना पर विश्वास नहीं कर पा रहा हूँ...लेकिन सच का घूँट तो पीना पड़ेगा...स्वीकार तो करना पड़ेगा...भीगी पलकों और रुंधे गले से एक गुजारिश अपने नव युवक साथियों से जरूर करूँगा..कि जब भी बाइक चलाये धीमी गति से चलाये...पूरी सावधानी से चले...अपने जीवन के लिए...अपने परिवार के लिए...और दोस्तों अपने इस नाचीज मित्र के लिए...मैं नहीं चाहता हूँ कि मेरा अब कोई अंग क्षतिग्रस्त हो...जिंदगी के इस पथ पर मुझे आपके सहयोग की जरूरत है...इस पत्रकारिता के उत्थान के लिए....इस भारत महान के लिए..दोस्त इस गुजारिश पर गौर कीजिये...

Monday, February 14, 2011

अल्हड़ता,अक्खड़ता की अनोखी अदा

मध्य प्रदेश का एक अदना सा जिला..नया नवेली सल्तनत..लेकिन अपने आपमें ऐतिहासिक तथ्यों को समेटे अपनी समृद्धता और सम्पन्नता को बढाता है...अलीराजपुर का एक छोटा सा क़स्बा भाभरा...जिसकी सुन्दरता के बारे में जितना कहा जाये कम है...भाभरा के बारे में बता दे..ये वही क़स्बा है..जहाँ कभी न झुकने वाले चंद्रशेखर आज़ाद ने जन्म लिया था...अपने बचपन के १४ साल बिताये...बीच कसबे में दूसरे मकानों के बीच बनी एक छोटी सी कुटिया...जिसके बाहर आज़ाद के तराने लिखे गए हैं....मगर अफ़सोस कि चंद्रशेखर आज़ाद की इस नगरी का नाम बदलकर भाभरा से आज़ाद नगर नहीं किया गया...जबकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह इसकी घोषणा भी कर चुके हैं...खैर..राजनैतिक मामला..लेकिन इसी कसबे का एक शख्स ऐसा दिखा जो आज़ाद के प्रति पूर्णतया समर्पित है....आज़ाद की कुटिया के ५ओ कदम आगे जाने पर एक दरजी की दुकान पड़ती है...उसका बोर्ड पढने पर पता चला..ये आज़ाद नगर है...केवल यही एक बंदा है जो अपनी दुकान के पते में आज़ाद नगर का ज़िक्र कर रहा है....यानि इस नगरी के नाम परिवर्तन के लिए मौन आन्दोलन चला रहा है....आगे जाकर जब यहाँ के लोगों से मिलने का मौका मिला...तो सब में आज़ाद प्रवृत्ति का समावेश पाया...यहाँ की आवो-हवा को जब अपनी साँसों में खिंचा तो खुद एक जोश और जूनून से लबरेज़ पाया..यहाँ का पानी इस आस से पिया कि आज़ाद की रगों में खून बनकर दौड़ने वाला यहाँ का पानी मुझे भी बेफिक्री में जीना सिखा दे...मुझमे भी वो अक्खडपन,अल्हड़ता आ जाये..जिसके दम पर आज़ाद मरते दम तक आज़ाद रहा...यदि आज़ाद मरते दम तक आज़ाद रहे..यदि उनमे स्वाधीनता का भाव आया तो मै इसका श्रेय उनको नहीं देता..बल्कि इसके लिए उनकी जन्मभूमि का ज्यादा योगदान रहा...यहाँ के हर शख्स को मैंने अजीब सी बेफिक्री,अक्खड़ता में जीते देखा...अगर आज़ाद में अपने आत्म सम्मान के प्रति भाव था...तो इसमें उनका स्वाभाव नहीं..बल्कि यहाँ की मिट्टी की सौंधी और स्वभिमानिता की खुशबू का असर था...जिसका अन्न आज़ाद की नस नस में दौड़ रहा था...बड़ा गौरवान्वित महसूस कर रहा था...इस परम पुनीत नगरी में आकर...मन ही मन इस पवित्र नगरी को प्रणाम किया...और आशा की..कि यहाँ का पानी भी मेरी रगों में आज़ाद प्रवृत्ति और फक्कडपन लाएगी...अल्हड़ता और अक्खड़ता जिससे देश सेवा का मार्ग प्रशस्त हो सके...और मरते दम तक आज़ाद रह सकूँ...साथ ही भीम और हिडिम्बा जिस स्थान पर मिले थे उस स्थान को देखने का मौका भी मिला...जब उस स्थान को देखा तो महाभारत की एक एक याद ताज़ी हो गई....बाते ढेर सारी हैं..बस अब भी बार बार आज़ाद कि नगरी को प्रणाम करने को मन करता है...भगवान मुझे भी आज़ाद प्रवृत्ति प्रदान करे...यही दुआ बार बार करता हूँ...
कृष्ण कुमार द्विवेदी
छात्र(मा.रा.प.वि.वि.भोपाल)

Saturday, February 12, 2011

जहाँ दूल्हे पहनते है गुटखों की मालाएं

शादी में दुल्हे के गले में फूलों की माला नहीं..बल्कि राजश्री और विमल जैसे पान मसालों क़ी माला होती है...बड़ा अजीब लगा देखकर...एक तरफ तो लोग दूल्हे के जीवन की दूसरी पारी शुरू करने की शुभकामनाये देते है...तो दूसरी ओर उनके गले में मौत का सामान लटकाकर शगुन की रस्म अदायगी की जाती है...बड़ी विडंवना है....कैंसर जैसी भयावह बीमारियों को जन्म देने वाल्व पान मसालों को गले मे लटकाकर दूल्हे दुल्हन को विदा करने जाते है....ऐसे में अब दुल्हन के सुहाग के जीवित रहने की गारंटी कौन ले... की तस्वीर देखी तो पाया क़ी भाले उस घर में खाने को दो जून की रोटी न हो लेकिन हर घर में मोबाइल और पान मसालों के पाउच जरूर मिल जायेगे...मतलब खाने से ज्यादा जरूरत लोगों को मोबाइल क़ी...सूचना क्रांति की ऐसी बयार अन्यत्र कहीं नहीं देखी....ना पान मसालों के प्रति दीवानगी...

भारत गाँवों का देश कहा जाता है...किसानों को ग्राम देवता के नाम से नवाजा गया है.. भारत की आत्मा गाँवों में बसती है...एहसास तब हुआ जब आदिवासी इलाकों के गाँव-गाँव जाकर सच से रु ब रु हुआ...सवाल विकास का था..मुद्दा विकास कार्यों के क्रियान्वयन का था...सो रतलाम,झाबुआ,अलीराजपुर के ग्राम देवताओं से मिलने पहुच गए..स्वर्ग सी सुन्दरता की चादर ओढ़े गाँवों में...वहां कि खूबसूरती के क्या कहने...लेकिन एक बात मुझे अब तक समझ नहीं आई कि रतलाम के गाँवों के बच्चे गाड़ी के रुकते ही उलटे पैर भागना क्यों शुरू कर देते थे...काफी उधेड़बुन के बाद शायद सोच पाया हूँ..कि जब बचपन में बच्चा शैतानी करता है..तो मां कहती है बेटा बाबा पकड़ लेगा या आ जायेगा...और शायद वे बच्चे हम लोगों को बाबा का ही रूप मान लेते थे...खैर..डर भयानक होता है...गाँव के विकास की तस्वीर जब हम लोगों ने देखी तो लगा कि सरकार विकास की गंगा बहाने में लगी हुई है...कहीं पर तालाब निर्माण किया गया तो कहीं नादाँ फलोद्यान दिया गया...यानी किसानो के पलायन रोकने और उनके विकास करने को लेकर सरकार कटिबद्ध है.
मगर अफ़सोस भी हुआ कि यदि पूरा पैसा इस विकास में लग पाता तो शायद तस्वीर कुछ और होती...क्यों कि केवल बारिश कि फसल लेने वाले किसान अब साल में तीन फसल लेने लगे है...सामाजिक कार्यों में रूचि लेना भी शुरू कर दिया है...इसमें अधिलारियों का बहुत बढ़ा योगदान है...बिना आला अधिकारीयों कि पहल के कुछ भी संभव नहीं था...गाँव पहुंचकर जब लोगों का व्यवहार देखा तो समझ में आया..कि मेरे देश में मेहमानों क़ी कैसी आवभगत होती है...
मेरे देश में मेहमानों को भगवान कहा जाता है
वो यहीं का हो जाता है,जो कहीं से भी आता है
शायद यही वजह थी..क़ी मेरा भी मन उस आदिवासी इलाके में रमने लगा...वहां की संस्कृति..परम्पराओं से परिचित होने का मौका मिला...अद्भुत अनुभव रहा...शादी का माहौल आदिवासियों का देखा...उनके गाने और महिलाओं के शराब पीकर नाचने का अंदाज बहुत पसंद आया...चलते चलते आदिवासी लड़कियां लाल रंग क़ी चुनरी ओढ़े दिख जाती थी...पूंछने पर बताया गया..क़ी ये कुवांरी लड़कियों का संकेत है...वहां की औरतो की वेशभूषा देखी..तो एहसास हुआ क़ी हम लोग कपडे पहनना सिख गए..और अब कपडे काम भी कर दिए लेकिन वो महिलाये अभी तक पूरे कपडे पहनना नहीं सीखी....
एक गाँव में सरपंच के घर पर स्वागत ऐसे किया गया जैसे लड़की क़ी गोद भराई क़ी रस्म पूरी करने वाले आये हों...मक्के के भुट्टों से स्वागत किया गया..लाजवाब था...इतना प्यार और दुलार देखा तो समझ में आया क़ी हिंदुस्तान का दिल आजादी के ६४ साल बाद भी क्यों गाँव में बसता है...जबकि शहर में किसी को अपने पडोसी के बारे में भी खबर नहीं होती...गाँव का प्यार और दुलार हमेशा अविस्मरनीय रहेगा....ग्राम देवताओं को प्रणाम...

Tuesday, January 25, 2011

.....सीरत बदलनी चाहिए

गणतंत्र दिवस से बस एक दिन पूर्व राजधानी में गणतंत्र दिवस की स्कूल रैली जैसा माहौल दिखा..पीपुल्स समाचार की तरफ से आयोजित भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाई जा रही एक मुहीम के तहत इस रैली का आयोजन किया गया...रैली बोर्ड ऑफिस चौराहे से शुरू हुई और बीजेपी कार्यालय के पास जाकर रुक गई...निश्तित रूप से एक सराहनीय कार्य...भ्रष्टाचार को मिटाने का...लेकिन एक प्रश्न भी मष्तिष्क में आता है...की इस रैली का क्या प्रायोजन...क्या हम कलम के दम पर इस मुहीम को नहीं छेड़ सकते थे...पीपुल्स समाचार ने कई दिनों तक इस मुहीम को कलम के द्वारा भी जिलाए रखा...लेकिन समापन के मौके पर...जहाँ कई सडको पर सुरक्षा व्यवस्था चौकस थी..तो कई सडको को गणतंत्र दिवस के कारण बंद भी किया गया था...ऐसे में युवाओं का एक लम्बा हुजूम राजधानी की सड़कों पर निकल रहा है....तो यातायात व्यवस्था चरमरानी थी...वैसा ही हुआ...अब हम और लोगों से अलग कैसे हुए...जब चौथा स्तम्भ भी समाज,प्रशासन के कार्यों में सहयोग देने की बजाय...परेशानी कड़ी कर दे तो निश्तित रूप से सोचना पड़ेगा...मेरा इरादा खबर देना या आलोचना करना नहीं है...लेकिन फिर भी एक कर्तव्यबोध के नाते फ़र्ज़ मेरा मुझे ऐसा लिखने को मजबूर कर रहा था...एक प्रशंसनीय प्रयास...मेरा इरादा था की 25 जनवरी की संध्या पर लिखू...कि सूरत बदलनी चाहिए...लेकिन फिर सोचा..शायद अब ये पंक्ति प्रासंगिक नहीं रही...अब सीरत बदलनी होगी...क्यों कि भ्रष्टचारिता के हमने कई आयामों को छुआ भी और देखा भी...बोफोर्स घोटाला,कैफीन बॉक्स घोटाला,चारा घोटाला,सुगनी देवी जमीं का घोटाला,ओलम्पिक खेलों में घोटाला...और फिर भी घोटालों कि कमी महसूस की गई..तो ए.राजा की जेब से घोटाले का जिन्न ही बाहर निकल आया...इतना बड़ा घोटाला था..कि एक मजदूर तो रकम सुनते ही बेहोश हो जाए...एक कर्मचारी इतनी रकम देखकर हार्ट अटैक का शिकार हो जाये...लम्बी लिस्ट है...सूरत तो बदली...फिल्मों की शूटिंग के शोट्स क़ी तरह ज्यों ही समय की रफ़्तार ने एक्शन बोला..एक नई सूरत...नए शोट्स के साथ...कट हुआ..एक्शन बोला दूसरी सूरत....लेकिन सभी की सीरत एक सी रही....भ्रष्टाचार में देश को पहला स्थान दिलाना है...और ये कोशिश आज तक जारी है...लोगों की अगर सीरत बदल जाए...कुछ चिंतन गरीबों..देश के लिए किया जाए तो कुछ सार्थक होगा...ऐसे प्रदर्शन...
लेकिन पता नहीं कब हमारा अंतर्मन जागेगा...हम कब पैसों की जगह नैतिक मूल्यों को तरजीह देंगे...ये किसी को नहीं मालूम...लेकिन करना होगा दोस्तों...आजादी का एक लम्बा अरसा बीत जाने के बाद भी अगर सूरत और सीरत नहीं बदल पाई..तो दोष किसका?हम सबका दोस्तों....हमें नैतिक मूल्यों क़ी दुहाई नहीं देनी है...इन्हें बचाना भी होगा....इसी आवाहन के साथ....
गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाइयाँ...

.....सीरत बदलनी चाहिए

गणतंत्र दिवस से बस एक दिन पूर्व राजधानी में गणतंत्र दिवस की स्कूल रैली जैसा माहौल दिखा..पीपुल्स समाचार की तरफ से आयोजित भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाई जा रही एक मुहीम के तहत इस रैली का आयोजन किया गया...रैली बोर्ड ऑफिस चौराहे से शुरू हुई और बीजेपी कार्यालय के पास जाकर रुक गई...निश्तित रूप से एक सराहनीय कार्य...भ्रष्टाचार को मिटाने का...लेकिन एक प्रश्न भी मष्तिष्क में आता है...की इस रैली का क्या प्रायोजन...क्या हम कलम के दम पर इस मुहीम को नहीं छेड़ सकते थे...पीपुल्स समाचार ने कई दिनों तक इस मुहीम को कलम के द्वारा भी जिलाए रखा...लेकिन समापन के मौके पर...जहाँ कई सडको पर सुरक्षा व्यवस्था चौकस थी..तो कई सडको को गणतंत्र दिवस के कारण बंद भी किया गया था...ऐसे में युवाओं का एक लम्बा हुजूम राजधानी की सड़कों पर निकल रहा है....तो यातायात व्यवस्था चरमरानी थी...वैसा ही हुआ...अब हम और लोगों से अलग कैसे हुए...जब चौथा स्तम्भ भी समाज,प्रशासन के कार्यों में सहयोग देने की बजाय...परेशानी कड़ी कर दे तो निश्तित रूप से सोचना पड़ेगा...मेरा इरादा खबर देना या आलोचना करना नहीं है...लेकिन फिर भी एक कर्तव्यबोध के नाते फ़र्ज़ मेरा मुझे ऐसा लिखने को मजबूर कर रहा था...एक प्रशंसनीय प्रयास...मेरा इरादा था की 25 जनवरी की संध्या पर लिखू...कि सूरत बदलनी चाहिए...लेकिन फिर सोचा..शायद अब ये पंक्ति प्रासंगिक नहीं रही...अब सीरत बदलनी होगी...क्यों कि भ्रष्टचारिता के हमने कई आयामों को छुआ भी और देखा भी...बोफोर्स घोटाला,कैफीन बॉक्स घोटाला,चारा घोटाला,सुगनी देवी जमीं का घोटाला,ओलम्पिक खेलों में घोटाला...और फिर भी घोटालों कि कमी महसूस की गई..तो ए.राजा की जेब से घोटाले का जिन्न ही बाहर निकल आया...इतना बड़ा घोटाला था..कि एक मजदूर तो रकम सुनते ही बेहोश हो जाए...एक कर्मचारी इतनी रकम देखकर हार्ट अटैक का शिकार हो जाये...लम्बी लिस्ट है...सूरत तो बदली...फिल्मों की शूटिंग के शोट्स क़ी तरह ज्यों ही समय की रफ़्तार ने एक्शन बोला..एक नई सूरत...नए शोट्स के साथ...कट हुआ..एक्शन बोला दूसरी सूरत....लेकिन सभी की सीरत एक सी रही....भ्रष्टाचार में देश को पहला स्थान दिलाना है...और ये कोशिश आज तक जारी है...लोगों की अगर सीरत बदल जाए...कुछ चिंतन गरीबों..देश के लिए किया जाए तो कुछ सार्थक होगा...ऐसे प्रदर्शन...
लेकिन पता नहीं कब हमारा अंतर्मन जागेगा...हम कब पैसों की जगह नैतिक मूल्यों को तरजीह देंगे...ये किसी को नहीं मालूम...लेकिन करना होगा दोस्तों...आजादी का एक लम्बा अरसा बीत जाने के बाद भी अगर सूरत और सीरत नहीं बदल पाई..तो दोष किसका?हम सबका दोस्तों....हमें नैतिक मूल्यों क़ी दुहाई नहीं देनी है...इन्हें बचाना भी होगा....इसी आवाहन के साथ....
गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाइयाँ...