Saturday, January 22, 2011

.ब्रेकिंग न्यूज़ की बदलती शक्ल..

आजकल बड़ी ही ऊहापोह की स्थिति मै हूँ...जब दिन भर घूमकर कमरे पर जाता हूँ...तो मेरा एक जूनिअर...खाई वो जूनियर काम भाई ज्यादा है...साथ रहते रहते आत्मीयता और पारिवारिक माहौल बन गया है.....मेरा जूनियर अक्सर भोपाल में छोटे छोटे चैनलों की की आई बाढ़ के बारे में पूंछता है...क्या होगा कृष्णा भैया भविष्य का...कैसे कटेगा पूरा जीवन...छोटा कहीं हताश न हो...इसलिए हमेशा उसे समझाइश देता रहता हूँ...आशीष संघर्ष करो...मजा आएगा...जब सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी...पर दरअसल बात ये है...कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया की पत्रकारिता को देखकर मैं भी परेशान हो जाता हूँ...कभी दिन भर हंसी के ठहाकों का चलना...तो कभी पुराने रेकॉर्डेड कार्यक्रम चलाकर दर्शकों को बेवकूफ बनाना...या बाईट के नाम पर कहीं पर भी कट लगाकर किसी को फ़साना...अजीब लगता है सब...अब एक चैनल जो खबर चलाता है कि जस्टिस के यहाँ फटा दूध...प्रमुख सचिव को काटा कौवे ने...बस इस तरह की पत्रकारिता में कैसे कटेगी जिंदगी...
एक बानगी देखिये जरा...

जस्टिस जैन के घर फटा दूध..

ईटीवी, राजस्थान पर आजकल कुछ इसी तरह के न्यूज फ्लैश किए जाते हैं. पट्टी पर चलने वाली खबरों का स्तर बेहद गिरा है. कुछ भी चला दिया जाता है.

किसी के घर दूध फटा तो किसी ने चाय पी.... जैसी स्थितियां भी अब न्यूज है. संभव है रीजनल न्यूज चैनलों के लिए ये खबर हो. पर आप क्या मानते हैं. इस तस्वीर को ध्यान से देखिए और बताइए कि आखिर जस्टिस जैन के घर का दूध किसने फाड़ा होगा? क्या किसी आतंकवादी ने? या सरकारी साजिश है? या ग्वाले ने? आखिर किसने फाड़ा होगा पूर्व जस्टिस एनके जैन के घर का दूध....???:)

ब्रेकिंग न्यूज... मुख्य सचिव को कौवे ने काटा..(...bhadas4media से साभार)


ज़रा, एक और बानगी देखिये. इसे ETV, Rajasthan की पट्टी कहते हैं... "मुख्य सचिव एस अहमद को कोवे ने काटा".

अब ऐसे में जब चैनल मक्खनबाजी में ही जुटा है...तो फिर आम जानता की बात कौन करेगा...भोपाल का भी एक चैनल है...जिसमे साफ़ तौर पर निर्देश दिया गया है..कि मुख्यमंत्री के खिलाफ कुछ नहीं बोलना है...ऐसी ख़बरें चलाना साफ़ तौर पर प्रतिबंधित की गई है....पता नहीं कहाँ ले जाएगी हमें ये बे सर पैर की पत्रकारिता.....चिंतन और मनन...मै आप लोगों पर छोड़ता हूँ...

Tuesday, January 18, 2011

अबला नहीं भीष्मा कहिये.

नशाखोरी समाज में इतनी भीषण तरीके से अपनी जड़ें फैला चुका है...कि बरगद कि हर एक टहनी से निकलने वाली जड़ों कि संज्ञा इसको दें तो शायद काम होगी...सवाल समाज के लोगों का है...आपका है...हम सबका है....आखिर इस मौज भरी जिन्दगी में हमें किस बात का तनाव...जब रिश्ते नाते टूट रहे है...उनमे बिखराव हो रहा है..भाई भाई को कट रहा है...बेटा मां-बाप की हत्या कर रहा है....खबरिया चैनल मानव मूल्यों की हत्या करने में लगे है....किसी को किसी के बारे में सोचने का वक़्त नहीं है...तो तनाव क्यों...हम भी बेफिक्री में क्यों नहीं जीते...पर नहीं जी सकते है दोस्त....इन रगों में आवो हवा आज भी उस गाँव की मौजूद है...उस गाँव की नदी कुओं का पानी रक्त बनकर इस जिस्म में दौड़ रहा है....जो बिसलरी की बोतल से कहीं ज्यादा पवित्र और शुद्ध है....यदि ऐसा नहीं तो गंदगी बजबजायी गंगा को हम आज भी मैया क्यों कहते है...किसी भी सोच की शुरुवात गाँव से ही होती है...ऐसी ही शुरुवात नशाखोरी मुक्त समाज की हुई है सिवनी जिले के एक गाँव से.....जहाँ की औरतों ने निश्चय किया है की यदि उनके पतियों ने शराब पी तो वे उससे तलाक मांग लेगी...यही नहीं यदि गाँव में कोई शराब बेंचता या पीता पकड़ा जाता है तो उसे डेढ़ हजार रूपए का जुरमाना ग्राम पंचायत को देना होगा...इसके अलावा शराब पीने वाले की सूचना देने वाले को ग्राम पंचायत एक हजार रूपए का इनाम देगी...जिला मुख्यालय से करीब ३५ किमी.दूर आदिवासी बाहुल्य ढुतेरा गाँव की महिलाओं ने गाँव को नशामुक्त बनाने का संकल्प किया है...एक हजार चार सौ दस लोगो की आबादी वाले इस गाँव में आज से आठ साल पहले गाँव के युवकों की शराब पीने से मौत हो गई थी...मौत के बाद गाँव के लोगों ने बैठकर शराब न पीने और बेंचने का संकल्प लिया...तब पुरुषों ने कमान संभाली..अब महिलाये इसकी केंदीय भूमिका में है....इस नेक काम में कलाबाई ने सबसे पहले अपने शराबी पति से रिश्ता तोड़ दिया है......बड़ा ही दिलेरी का काम किया है कलावती ने....हर किसी में शायद कलावती जैसी हिम्मत नहीं होती...पर शायद जब संकल्प लिया है...तो रिश्ते नाते भी दूर होगे...शायद महाभारत के पात्र अम्बा को भी तो भीष्मा कह सकते है....मुझे महाभारत की एक पात्र अम्बा का नाम याद आ रहा है....जब देवव्रत भीष्म ने.उनका हरण किया....तो वे शादी के लिए तैयार नहीं थी...हस्तिनापुर से उनकी ससम्मान विदाई कर दी गई...लेकिन शाल्वराज ने उनको अपनी अर्धांगिनी बनाने से मन कर दिया....तब वो भीष्म से शादी के लिए तैयार तो हुई..पर भीष्म ने शादी न करने की प्रतिज्ञा की थी...अब सवाल था कैसे अम्बा का जीवन कटेगा...तब अम्बा ने जो प्राण किया था की भीष्म का संहार मै करुगी...और तपस्या करने लगी...और तभी कठिन साधना के कारण उनका नाम भीष्मा पड़ा.... इस गाँव की सभी भीष्माओं को मेरा सलाम

Saturday, January 8, 2011

आज भी याद है...

चार अक्षर पढने को मै आया शहर
गाँव हरपल मुझे याद आता रहा
साथ बैठे दोस्तों की वो अठखेलियाँ
वो बचपन की कृत्रिम बोलियाँ
वो बैठकर मंदिर पर बैठकर की गपवाजी कभी
लोट पोट हो जाते थे सुन कर सभी
वो मां का दुलार
वो पापा की लताड़
आज भी याद है...
वो खेतो पर जाकर मटर की फली
वो गाँव में पारो के घर की गली
चलने लगा जब घर से शहर के लिए
किसी ने मांगी दुआ,तो कोई बोला
चलो एक बला तो टली
पाकर शहर में दोस्तों का प्यार
वो मां का स्नेह वो दुलार
वो पिता की लताड़
सब कुछ मिला
मां देवकी और वसुदेव को छोड़ आया जो गाँव में
नन्द बाबा और मैया यशोदा का भी प्यार पाया
खुसनसीब हूँ कि इतना कृष्ण तो बन गया
बस अब एक कंस कि दरकार है...
सही मायने मै कृष्ण बन सकूँ.
बस यही एक चाह है....

Monday, January 3, 2011

नई सदी की ग़मगीन शाम..

नई सदी का नया सवेरा नया वर्ष,नया उत्साह,नया हर्ष,नई उम्मीदें,आशा की नई किरण....जो कल था वो आज नहीं रहा,और जो आज समय है वो कल नहीं रहेगा...वक़्त तो अपनी रफ़्तार से दौड़ता ही रहता है....लेकिन जो वक़्त कि रफ़्तार के साथ कदम मिला के चला,वही तो बनता है सिकंदर... लेकिन पत्रकारिता विश्वविध्यालय का एक योद्धा दौड़ने के पहले ही कदम ठिठका कर खड़ा हो गया....दोस्तों ने कहा..तुझे चलना होगा....तुझे पत्रकारिता जगत को नया आयाम देना है...तुझे बोलना होगा...उठाना होगा...मौत से जीतना होगा....लड़ना है जमाने से....देखो पूरा विश्वविद्यालय बुला रहा है तुम्हे...उठो मनेन्द्र....चलो....परिक्षये ख़त्म हुई....घर पर सब इंतजार कर रहे है.......जाने नहीं देंगे तुझे...जाने तुझे देंगे नहीं....मां ने ख़त में क्या लिखा था...जिए तू जुग-जुग ये कहा था....चार पल भी जी न पाया तू........लेकिन वो ऐसे नीद के आगोश में सोया की फिर उठ नहीं पाया......

अभी कल की ही तो बात है,जब मैंने नई सदी का नया सवेरा की मंगल कामना की थी....मगर अफ़सोस की पत्रकारिता विश्वविद्यालय से समय ने एक ऐसा योद्धा छीना....जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता....

भोपाल के रेडक्रास अस्‍पताल में इलाज के दौरान पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय के एक होनहार छात्र हम सबको छोड़कर चला गया. वह विज्ञान पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था. छात्र के सहपाठियों ने इलाज करने वाले डाक्‍टर पर गलत इंजेक्शन लगाने का आरोप लगाया है. डाक्‍टर उक्‍त छात्र की मौत हार्ट अटैक के चलते होने की आशंका जता रहे है. पुलिस ने छात्र के शव को पोस्‍टमार्टम के लिए हमीदिया अस्‍पताल भेज दिया है.

रचना नगर में रहने वाले छात्र मनेंद्र पांडेय (28 वर्ष) को अचानक सीने में दर्द हुआ. जिसके बाद उसे इलाज के लिए रेडक्रास अस्‍पताल में भर्ती कराया गया. दर्द तेज होने पर वहां मौजूद डाक्‍टर अजय सिंह ने उसे इंजेक्शन लगाया. इसके करीब पंद्रह-बीस मिनट बाद मनेंद्र की मौत हो गई. मनेंद्र को इसके पहले भी सीने में दर्द हुआ था. जिसे कम करने के लिए उसने दर्द निवारक दवाएं ली थी.

पता नहीं इस नई सदी के आगाज में हम लोगो से कहाँ गलती हुई कि हमारा एक मित्र ऐसे रूठा....कि पूरा विश्वविद्यालय उसके कदमो में बैठा है...पर वह अड़ियल है....किसी कि बात नहीं मान रहा है.....वो हमसे दूर जाने की ठान चुका है....देखो कैसे हाथ छुड़ा के भाग रहा है.....कोई रोको उसे...कोई तो मनाओ.....कोई तो होगा जिसकी बात माने.....एकलव्य जी आप ही समझाए......पी.पी.सर आप ही आदेश दो इसे...आपकी बात नहीं काटेगा....

लेकिन शायद पी.पी.सर में भी अब मनेन्द्र को आदेश देने की ताकत नहीं बची....सबके गले रुंधे है....सबको मनेन्द्र से विछोह का दुःख है.....लौट आओ मनेन्द्र ...जुबान पर यही लब्ज है.....लेकिन वो जा रहा है...हम सबको अकेला छोड़कर.....

लौट आओ मनेन्द्र....हम चाय पीने चलेगे.....

कृष्ण कुमार द्विवेदी

छात्र(मा.रा.प.विवि,भोपाल)

Sunday, January 2, 2011

नई सदी का नया सवेरा

नया वर्ष,नया उत्साह,नया हर्ष,नई उम्मीदें,आशा की नई किरण....जो कल था वो आज नहीं रहा,और जो आज समय है वो कल नहीं रहेगा...वक़्त तो अपनी रफ़्तार से दौड़ता ही रहता है....लेकिन जो वक़्त कि रफ़्तार के साथ कदम मिला के चला,वही तो बनता है सिकंदर...
पुराना साल,हर साल की तरह कुछ खट्टी मीठी यादें छोड़ गया...कुछ अनसुलझे सवाल,गुत्थियाँ भी...जिनको हम आगे आने वाले समय में विचार कर सकें,और सही डगर पर चल सकें.....इस साल की शुरुआत के साथ एक ख़ुशी और...की इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक की शुरुवात भी हो गई.....जैसा पहला दशक निकला समाज में कुछ विसंगतियों के साथ,कुछ नए अनुभवों के साथ गुजरा....इस दशक की एक अनसुलझी गुत्थी आरुशी हत्याकांड...जिसमे सी.बी.आई. ने भी हाथ खड़े कर दिए...इसे अपराधी की शातिरता कहें या सी.बी.आई. की नाकामी...खैर...एक उम्मीद कि ये नया दशक भी कुछ उसी तरह या उससे बेहतर साबित हो.....
मुझे याद है कि जिस समय इक्कीसवीं सदी के पहले दशक कि शुरुआत होने वाली थी,उस समय मै कक्षा सात में पढने वाला गाँव का एक भोला सा आम लड़का था...जिसकी न एक अलग सोच थी...न विचार...हाँ...नए साल से एक उम्मीद जरूर थी...कि शायद दुनिया ख़त्म नहीं होगी...क्यों कि उस समय भी ये अफवाह जोरों से चल रही थी कि १ जनवरी २००० को दुनिया ख़त्म हो जायेगी....लेकिन तर्क किसी के पास नहीं था......लेकिन समय गया...गुजरा ...दुनिया आज भी कायम है....समय आज भी अपनी गति से चलायमान है....लेकिन अब २०१२ का भी दर लोगों के ज़ेहन में है.....लेकिन हम भारतीय भी आशावादी है....हम जीतेगे....क्यों कि हम सबमे परिस्थितियों से जूझने का जज्बा है...एक दशक के बाद आज मै एक ऐसे समाज का हिस्सा बन गया हूँ...जिसे अपने अलावा समाज के हर वर्ग के बारे विचार करना पड़ता है...अपने आप में एक सुखद एहसास...हर हिन्दुस्तानी की तरह मुझे भी नए साल से ढेरों उम्मीदें है....
१-क्रिकेट का वर्ल्ड कप इस बार भारत में आएगा.
२-भारत विश्व की एक महाशक्ति के रूप में उभरेगा.
३-संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता मिल जायेगी.
४-युवाशक्ति अपने होने का एहसास राजनीति में जरूर कराएगी.
५-साहित्य लेखन बढेगा.
६-पत्रकारिता के वेद व्यासों,और नारदों को सद्बुद्धि आएगी.
७-हर गरीब को रोजगार मिलेगा
8-हर बच्चे को पढने का अधिकार मिलेगा.
9-चिकित्सा के क्षेत्र में विकास होगा.
१०-हम आर्थिक रूप से भी मजबूत होंगे.
इन्ही अपेक्षाओं और उम्मीदों के साथ हम होंगे कामयाब की भावना के साथ सभी लोगों को
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं'

Sunday, November 28, 2010

पत्रकारिता कॉलेज पी गया छात्रों का पैसा





कों खां क्या चल रिया हेगा?केन लगे,कन्ने कट गए,सर पर दे रिया हे मिला मिला के......झीलों की नगरी भोपाल का अपना एक खास अंदाज है .भोपाल शहर अपनी खूबसूरती के लिए पूरे देश में जाना जाता है.साथ ही पत्रकारों की उद्गम स्थली अगर भोपाल को कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.भोपाल में समय के साथ बहुत तरक्की हुई.....मध्य प्रदेश में इसे एजूकेशन हब की उपाधि मिली...तो कई प्राईवेट समूहों ने यहाँ अपना वर्चस्व कायम किया.....ऐसा ही अपनी एक अलग सल्तनत बनाये हुए पीपुल्स समूह...जो कि स्वास्थ्य,शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर कदम बढ़ा रहा है ...मीडिया के बढ़ते ग्लैमर को देखते हुए पीपुल्स समूह ने २००७ में पीपुल्स पत्रकारिता शिक्षण संस्थान के नाम से एक पत्रकारिता महाविद्यालय की शुरुआत की.मध्य प्रदेश की पत्रकारिता से जुड़े कई नामचीन चेहरे इससे जुड़े.लेकिन अंदरूनी कलह और कॉलेज की गन्दी राजनीति के चलते धीरे धीरे ये सब लोग यहाँ से खिसकते गए.समस्या कॉलेज में पढाई की थी,प्रयोगात्मक रूप से छात्रों को सक्षम बनाने की थी.२००७ से करीब डेढ़ साल तक महाविद्यालय को सुचारू रूप से चलने का श्रेय तात्कालीन प्राचार्य विनोद तिवारी को जाता है.ये उनका व्यक्तित्व था कि वे व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर या प्रबंधन स्तर पर छात्रों की हर समस्या को सुलझा लेते थे.लेकिन विनोद तिवारी के जाने के बाद कॉलेज की स्थिति 'धोबी के कुत्ते' की तरह हो गई.न अब वह घर का रहा और न घाट का......बी.एन.गोस्वामी,पंकज पाठक,संदीप श्रीवास्तव ...एक एक कर सबने प्राचार्य का पद संभाला...लेकिन फिर कॉलेज का अंतर्कलह...और फिर शुरू हुआ इस्तीफों का दौर...
अंत में समूह की प्रबंधन टीम का हिस्सा आस्मां रिजवान को कॉलेज के प्राचार्य का पदभार सौंपा गया ...अभी तक आस्मां रिजवान,पीपुल्स समूह के मैनेजमेंट कॉलेज में व्याख्याता के तौर पर पढ़ाती थी.ऐसे में जब बागडोर आस्मां रिजवान ने संभाली तो पत्रकारिता के कॉलेज को उन्होंने मैनेजमेंट कॉलेज की लाठी से हांकना शुरू कर दिया..शायद पत्रकारिता कॉलेज चलने का अनुभव उनमें नहीं था.वे शायद भूल गईं थी कि उन्हें लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की उद्गम स्थली को क्रियान्वित करना है...हर छात्र कल का लोकतंत्र की आवाज है.अपनी तानाशाही आदत से मजबूर आस्मां रिजवान ने पहले तो सत्र के बीच में ही महाविद्यालय की फीस में इजाफा कर दिया...जबकि विवरण पुस्तिका में ऐसा कुछ भी उल्लिखित नहीं था..छात्रों को को प्रवेश के समय पूरी फीस के बारे बता दिया गया था....यदि उन छात्रों को बीच सत्र में फीस बढ़ने की बात पता होती तो शायद कई छात्र यहाँ पर प्रवेश नहीं लेते...लेकिन एक साल की पढाई के बाद अचानक फीस में हुई बढ़ोत्तरी को छात्रों ने अपने भविष्य को देखकर स्वीकार कर लिया........२००७-१० के बीच बी.एस.सी.(ई.एम् )करने वाले छात्रों का कोर्स जून २०१० में समाप्त हो गया....छात्रों ने जब विद्यालय में जमा अपनी कोशन मनी की मांग की...तो महाविद्यालय प्रबंधन की और से उन्हें झुनझुना पकड़ा दिया गया.....जबकि महाविद्यालय में प्रवेश के समय छात्रों को जो विवरण पुस्तिका मिली थी उसमे साफ़ तौर पर महावि.कोशन मनी,पुस्तकालय कोशन मनी का जिक्र किया गया है ....
यशवंत जी कोशन मनी का मतलब पैसों की पुनर्वापसी होता है....लेकिन महाविद्यालय प्रबंधन ने छात्रों को ५०० दुपाये देकर चलता कर दिया....बस अपनी प्रबंधकीय आवाज़ से छात्रों की आवाज़ को दबाने की कोशिश की जा रही है...................बस तानाशाही रवैये से चल रहा है कॉलेज ....



-कृष्ण कुमार द्विवेदी

Saturday, October 30, 2010

रणभूमि बने गाँव

भारत देश गांवों का देश कहा जाता है...क्यों कि यहाँ कि ७०% जनता गाँव में निवास करती है...भोले भाले लोग,सुबह सुबह गाय भैसों को दुहने जाते ग्रामीण,पनघट पर पानी भरने जाती यहाँ की औरतें..हाँ जमींदारो के यहाँ और बात है..कोई नौकर लगा हो या घर में ही कुआं हो,बात अलग होती है...लेकिन ज्यादातर गाँवों कि पहचान यही होती है...खेत पर जाते किसान ...यहाँ के मौसम भी उतने ही सुहाने लगते है जितने यहाँ के लोग...कभी सर्दी,कभी गर्मी,बारिश और पतझड़......बारिश के जाते ही हिन्दुस्तान की फिजाओं में सर्दीली हवाओं ने दस्तक दे दी है.....एक बयार ठंडी हवाओ की चलना शुरू हो गई...खैर मौसम है तो बयार भी चलेगी..और ठंडक का एहसास भी होगा....२६ जनवरी १९५० को देश का गणतंत्र लागू किया गया....गांधी ने राम राज्य की परिकल्पना दिल में संजोई थी....लेकिन उन्ही के टाइटल का प्रयोग करने वाली एक तानाशाही महिला ने उनकी इस सपने की धज्जियाँ उड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी.....आपातकाल के समय से ही राजनीती में गंदगी का दौर शुरू हुआ...खैर बात मुद्दे की...देश में चुनावों की बयार भी चल रही है...लेकिन इसका एहसास गर्म है.......उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव हो चुके है...तो बिहार में विधानसभा चुनाव अपने पूरे चरम पर है.....बात पंचायत चुनाव की....चुनाव हुए....इन चुनावों में कई रिश्ते टूटे..कई जातीय समीकरण बने...दबंगई देखने को मिली....तो कहीं से हत्या की खबरे भी आई.....और कहीं चुनाव की आचार संहिता के नाम पर पुलिस ने लोगों से अभद्रता की,और मां का अपमान किया....लोकतंत्र है...स्वतंत्रता है.....पंचायत चुनावों में कहीं भाई भाई ही एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लादे,तो कहीं बाप के खिलाफ बेटा....महिलाए भी पीछे नहीं थी...कूद पड़ी समर में और पति के खिलाफ ही ताल ठोंक दी.......लेकिन नतीजे भी सामने है.....जीत एक की ही होती है......पहले कहा जाता था कि जीत अर्जुन की ही होती है लेकिन अब जीत तिकड़मी,दबंगों और पहलवानों की होती है.....ऐसा नहीं है कि नतीजे आने के बाद चुनाव समाप्त हो गए....मेरे लिहाज से चुनाव जंग अब तो शुरू हुई है....जो पूरे पांच साल अगले पंचायत चुनाव तक चलेगी.....कहीं प्रधान अपने विरोधियों से बदला लेगा,तो कहीं प्रधान को ही मौत के घाट उतारा जाएगा.....आम जनता की भावनाओं की किसी को क़द्र नहीं...कि उसने किसे चुना,और क्यों....फिर होंगे उपचुनाव.....और जनता वोट देती रहेगी.....ठप्पा लगाती रहेगी.....जितना वर्णन गाँव के बारे में किया गया...शायद अब वो तस्वीर बदलने लगी है....या बदल चुकी है....गाँव के लोग सीधे नहीं रहे...खूनखराबा और सत्ता की मलाई चखने कई ललक उनमे भी आ गई है....और इस मलाई को चखने के लिए ओ किसी भी हद तक जाने को तैयार है.....खैर देखते है पांच साल का पंचायत चुनाव का अखाडा कितनो की बलि लेता है...कितने घर बर्बाद करता है.....आगे के पांच सालों में ही देखने को मिलेगा....तो देखिये गाँवों का महासंग्राम....
कृष्ण कुमार द्विवेदी
छात्र (मा.रा.प.विवि,भोपाल )