Saturday, February 12, 2011

जहाँ दूल्हे पहनते है गुटखों की मालाएं

शादी में दुल्हे के गले में फूलों की माला नहीं..बल्कि राजश्री और विमल जैसे पान मसालों क़ी माला होती है...बड़ा अजीब लगा देखकर...एक तरफ तो लोग दूल्हे के जीवन की दूसरी पारी शुरू करने की शुभकामनाये देते है...तो दूसरी ओर उनके गले में मौत का सामान लटकाकर शगुन की रस्म अदायगी की जाती है...बड़ी विडंवना है....कैंसर जैसी भयावह बीमारियों को जन्म देने वाल्व पान मसालों को गले मे लटकाकर दूल्हे दुल्हन को विदा करने जाते है....ऐसे में अब दुल्हन के सुहाग के जीवित रहने की गारंटी कौन ले... की तस्वीर देखी तो पाया क़ी भाले उस घर में खाने को दो जून की रोटी न हो लेकिन हर घर में मोबाइल और पान मसालों के पाउच जरूर मिल जायेगे...मतलब खाने से ज्यादा जरूरत लोगों को मोबाइल क़ी...सूचना क्रांति की ऐसी बयार अन्यत्र कहीं नहीं देखी....ना पान मसालों के प्रति दीवानगी...

भारत गाँवों का देश कहा जाता है...किसानों को ग्राम देवता के नाम से नवाजा गया है.. भारत की आत्मा गाँवों में बसती है...एहसास तब हुआ जब आदिवासी इलाकों के गाँव-गाँव जाकर सच से रु ब रु हुआ...सवाल विकास का था..मुद्दा विकास कार्यों के क्रियान्वयन का था...सो रतलाम,झाबुआ,अलीराजपुर के ग्राम देवताओं से मिलने पहुच गए..स्वर्ग सी सुन्दरता की चादर ओढ़े गाँवों में...वहां कि खूबसूरती के क्या कहने...लेकिन एक बात मुझे अब तक समझ नहीं आई कि रतलाम के गाँवों के बच्चे गाड़ी के रुकते ही उलटे पैर भागना क्यों शुरू कर देते थे...काफी उधेड़बुन के बाद शायद सोच पाया हूँ..कि जब बचपन में बच्चा शैतानी करता है..तो मां कहती है बेटा बाबा पकड़ लेगा या आ जायेगा...और शायद वे बच्चे हम लोगों को बाबा का ही रूप मान लेते थे...खैर..डर भयानक होता है...गाँव के विकास की तस्वीर जब हम लोगों ने देखी तो लगा कि सरकार विकास की गंगा बहाने में लगी हुई है...कहीं पर तालाब निर्माण किया गया तो कहीं नादाँ फलोद्यान दिया गया...यानी किसानो के पलायन रोकने और उनके विकास करने को लेकर सरकार कटिबद्ध है.
मगर अफ़सोस भी हुआ कि यदि पूरा पैसा इस विकास में लग पाता तो शायद तस्वीर कुछ और होती...क्यों कि केवल बारिश कि फसल लेने वाले किसान अब साल में तीन फसल लेने लगे है...सामाजिक कार्यों में रूचि लेना भी शुरू कर दिया है...इसमें अधिलारियों का बहुत बढ़ा योगदान है...बिना आला अधिकारीयों कि पहल के कुछ भी संभव नहीं था...गाँव पहुंचकर जब लोगों का व्यवहार देखा तो समझ में आया..कि मेरे देश में मेहमानों क़ी कैसी आवभगत होती है...
मेरे देश में मेहमानों को भगवान कहा जाता है
वो यहीं का हो जाता है,जो कहीं से भी आता है
शायद यही वजह थी..क़ी मेरा भी मन उस आदिवासी इलाके में रमने लगा...वहां की संस्कृति..परम्पराओं से परिचित होने का मौका मिला...अद्भुत अनुभव रहा...शादी का माहौल आदिवासियों का देखा...उनके गाने और महिलाओं के शराब पीकर नाचने का अंदाज बहुत पसंद आया...चलते चलते आदिवासी लड़कियां लाल रंग क़ी चुनरी ओढ़े दिख जाती थी...पूंछने पर बताया गया..क़ी ये कुवांरी लड़कियों का संकेत है...वहां की औरतो की वेशभूषा देखी..तो एहसास हुआ क़ी हम लोग कपडे पहनना सिख गए..और अब कपडे काम भी कर दिए लेकिन वो महिलाये अभी तक पूरे कपडे पहनना नहीं सीखी....
एक गाँव में सरपंच के घर पर स्वागत ऐसे किया गया जैसे लड़की क़ी गोद भराई क़ी रस्म पूरी करने वाले आये हों...मक्के के भुट्टों से स्वागत किया गया..लाजवाब था...इतना प्यार और दुलार देखा तो समझ में आया क़ी हिंदुस्तान का दिल आजादी के ६४ साल बाद भी क्यों गाँव में बसता है...जबकि शहर में किसी को अपने पडोसी के बारे में भी खबर नहीं होती...गाँव का प्यार और दुलार हमेशा अविस्मरनीय रहेगा....ग्राम देवताओं को प्रणाम...

Tuesday, January 25, 2011

.....सीरत बदलनी चाहिए

गणतंत्र दिवस से बस एक दिन पूर्व राजधानी में गणतंत्र दिवस की स्कूल रैली जैसा माहौल दिखा..पीपुल्स समाचार की तरफ से आयोजित भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाई जा रही एक मुहीम के तहत इस रैली का आयोजन किया गया...रैली बोर्ड ऑफिस चौराहे से शुरू हुई और बीजेपी कार्यालय के पास जाकर रुक गई...निश्तित रूप से एक सराहनीय कार्य...भ्रष्टाचार को मिटाने का...लेकिन एक प्रश्न भी मष्तिष्क में आता है...की इस रैली का क्या प्रायोजन...क्या हम कलम के दम पर इस मुहीम को नहीं छेड़ सकते थे...पीपुल्स समाचार ने कई दिनों तक इस मुहीम को कलम के द्वारा भी जिलाए रखा...लेकिन समापन के मौके पर...जहाँ कई सडको पर सुरक्षा व्यवस्था चौकस थी..तो कई सडको को गणतंत्र दिवस के कारण बंद भी किया गया था...ऐसे में युवाओं का एक लम्बा हुजूम राजधानी की सड़कों पर निकल रहा है....तो यातायात व्यवस्था चरमरानी थी...वैसा ही हुआ...अब हम और लोगों से अलग कैसे हुए...जब चौथा स्तम्भ भी समाज,प्रशासन के कार्यों में सहयोग देने की बजाय...परेशानी कड़ी कर दे तो निश्तित रूप से सोचना पड़ेगा...मेरा इरादा खबर देना या आलोचना करना नहीं है...लेकिन फिर भी एक कर्तव्यबोध के नाते फ़र्ज़ मेरा मुझे ऐसा लिखने को मजबूर कर रहा था...एक प्रशंसनीय प्रयास...मेरा इरादा था की 25 जनवरी की संध्या पर लिखू...कि सूरत बदलनी चाहिए...लेकिन फिर सोचा..शायद अब ये पंक्ति प्रासंगिक नहीं रही...अब सीरत बदलनी होगी...क्यों कि भ्रष्टचारिता के हमने कई आयामों को छुआ भी और देखा भी...बोफोर्स घोटाला,कैफीन बॉक्स घोटाला,चारा घोटाला,सुगनी देवी जमीं का घोटाला,ओलम्पिक खेलों में घोटाला...और फिर भी घोटालों कि कमी महसूस की गई..तो ए.राजा की जेब से घोटाले का जिन्न ही बाहर निकल आया...इतना बड़ा घोटाला था..कि एक मजदूर तो रकम सुनते ही बेहोश हो जाए...एक कर्मचारी इतनी रकम देखकर हार्ट अटैक का शिकार हो जाये...लम्बी लिस्ट है...सूरत तो बदली...फिल्मों की शूटिंग के शोट्स क़ी तरह ज्यों ही समय की रफ़्तार ने एक्शन बोला..एक नई सूरत...नए शोट्स के साथ...कट हुआ..एक्शन बोला दूसरी सूरत....लेकिन सभी की सीरत एक सी रही....भ्रष्टाचार में देश को पहला स्थान दिलाना है...और ये कोशिश आज तक जारी है...लोगों की अगर सीरत बदल जाए...कुछ चिंतन गरीबों..देश के लिए किया जाए तो कुछ सार्थक होगा...ऐसे प्रदर्शन...
लेकिन पता नहीं कब हमारा अंतर्मन जागेगा...हम कब पैसों की जगह नैतिक मूल्यों को तरजीह देंगे...ये किसी को नहीं मालूम...लेकिन करना होगा दोस्तों...आजादी का एक लम्बा अरसा बीत जाने के बाद भी अगर सूरत और सीरत नहीं बदल पाई..तो दोष किसका?हम सबका दोस्तों....हमें नैतिक मूल्यों क़ी दुहाई नहीं देनी है...इन्हें बचाना भी होगा....इसी आवाहन के साथ....
गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाइयाँ...

.....सीरत बदलनी चाहिए

गणतंत्र दिवस से बस एक दिन पूर्व राजधानी में गणतंत्र दिवस की स्कूल रैली जैसा माहौल दिखा..पीपुल्स समाचार की तरफ से आयोजित भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाई जा रही एक मुहीम के तहत इस रैली का आयोजन किया गया...रैली बोर्ड ऑफिस चौराहे से शुरू हुई और बीजेपी कार्यालय के पास जाकर रुक गई...निश्तित रूप से एक सराहनीय कार्य...भ्रष्टाचार को मिटाने का...लेकिन एक प्रश्न भी मष्तिष्क में आता है...की इस रैली का क्या प्रायोजन...क्या हम कलम के दम पर इस मुहीम को नहीं छेड़ सकते थे...पीपुल्स समाचार ने कई दिनों तक इस मुहीम को कलम के द्वारा भी जिलाए रखा...लेकिन समापन के मौके पर...जहाँ कई सडको पर सुरक्षा व्यवस्था चौकस थी..तो कई सडको को गणतंत्र दिवस के कारण बंद भी किया गया था...ऐसे में युवाओं का एक लम्बा हुजूम राजधानी की सड़कों पर निकल रहा है....तो यातायात व्यवस्था चरमरानी थी...वैसा ही हुआ...अब हम और लोगों से अलग कैसे हुए...जब चौथा स्तम्भ भी समाज,प्रशासन के कार्यों में सहयोग देने की बजाय...परेशानी कड़ी कर दे तो निश्तित रूप से सोचना पड़ेगा...मेरा इरादा खबर देना या आलोचना करना नहीं है...लेकिन फिर भी एक कर्तव्यबोध के नाते फ़र्ज़ मेरा मुझे ऐसा लिखने को मजबूर कर रहा था...एक प्रशंसनीय प्रयास...मेरा इरादा था की 25 जनवरी की संध्या पर लिखू...कि सूरत बदलनी चाहिए...लेकिन फिर सोचा..शायद अब ये पंक्ति प्रासंगिक नहीं रही...अब सीरत बदलनी होगी...क्यों कि भ्रष्टचारिता के हमने कई आयामों को छुआ भी और देखा भी...बोफोर्स घोटाला,कैफीन बॉक्स घोटाला,चारा घोटाला,सुगनी देवी जमीं का घोटाला,ओलम्पिक खेलों में घोटाला...और फिर भी घोटालों कि कमी महसूस की गई..तो ए.राजा की जेब से घोटाले का जिन्न ही बाहर निकल आया...इतना बड़ा घोटाला था..कि एक मजदूर तो रकम सुनते ही बेहोश हो जाए...एक कर्मचारी इतनी रकम देखकर हार्ट अटैक का शिकार हो जाये...लम्बी लिस्ट है...सूरत तो बदली...फिल्मों की शूटिंग के शोट्स क़ी तरह ज्यों ही समय की रफ़्तार ने एक्शन बोला..एक नई सूरत...नए शोट्स के साथ...कट हुआ..एक्शन बोला दूसरी सूरत....लेकिन सभी की सीरत एक सी रही....भ्रष्टाचार में देश को पहला स्थान दिलाना है...और ये कोशिश आज तक जारी है...लोगों की अगर सीरत बदल जाए...कुछ चिंतन गरीबों..देश के लिए किया जाए तो कुछ सार्थक होगा...ऐसे प्रदर्शन...
लेकिन पता नहीं कब हमारा अंतर्मन जागेगा...हम कब पैसों की जगह नैतिक मूल्यों को तरजीह देंगे...ये किसी को नहीं मालूम...लेकिन करना होगा दोस्तों...आजादी का एक लम्बा अरसा बीत जाने के बाद भी अगर सूरत और सीरत नहीं बदल पाई..तो दोष किसका?हम सबका दोस्तों....हमें नैतिक मूल्यों क़ी दुहाई नहीं देनी है...इन्हें बचाना भी होगा....इसी आवाहन के साथ....
गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाइयाँ...

Saturday, January 22, 2011

.ब्रेकिंग न्यूज़ की बदलती शक्ल..

आजकल बड़ी ही ऊहापोह की स्थिति मै हूँ...जब दिन भर घूमकर कमरे पर जाता हूँ...तो मेरा एक जूनिअर...खाई वो जूनियर काम भाई ज्यादा है...साथ रहते रहते आत्मीयता और पारिवारिक माहौल बन गया है.....मेरा जूनियर अक्सर भोपाल में छोटे छोटे चैनलों की की आई बाढ़ के बारे में पूंछता है...क्या होगा कृष्णा भैया भविष्य का...कैसे कटेगा पूरा जीवन...छोटा कहीं हताश न हो...इसलिए हमेशा उसे समझाइश देता रहता हूँ...आशीष संघर्ष करो...मजा आएगा...जब सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी...पर दरअसल बात ये है...कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया की पत्रकारिता को देखकर मैं भी परेशान हो जाता हूँ...कभी दिन भर हंसी के ठहाकों का चलना...तो कभी पुराने रेकॉर्डेड कार्यक्रम चलाकर दर्शकों को बेवकूफ बनाना...या बाईट के नाम पर कहीं पर भी कट लगाकर किसी को फ़साना...अजीब लगता है सब...अब एक चैनल जो खबर चलाता है कि जस्टिस के यहाँ फटा दूध...प्रमुख सचिव को काटा कौवे ने...बस इस तरह की पत्रकारिता में कैसे कटेगी जिंदगी...
एक बानगी देखिये जरा...

जस्टिस जैन के घर फटा दूध..

ईटीवी, राजस्थान पर आजकल कुछ इसी तरह के न्यूज फ्लैश किए जाते हैं. पट्टी पर चलने वाली खबरों का स्तर बेहद गिरा है. कुछ भी चला दिया जाता है.

किसी के घर दूध फटा तो किसी ने चाय पी.... जैसी स्थितियां भी अब न्यूज है. संभव है रीजनल न्यूज चैनलों के लिए ये खबर हो. पर आप क्या मानते हैं. इस तस्वीर को ध्यान से देखिए और बताइए कि आखिर जस्टिस जैन के घर का दूध किसने फाड़ा होगा? क्या किसी आतंकवादी ने? या सरकारी साजिश है? या ग्वाले ने? आखिर किसने फाड़ा होगा पूर्व जस्टिस एनके जैन के घर का दूध....???:)

ब्रेकिंग न्यूज... मुख्य सचिव को कौवे ने काटा..(...bhadas4media से साभार)


ज़रा, एक और बानगी देखिये. इसे ETV, Rajasthan की पट्टी कहते हैं... "मुख्य सचिव एस अहमद को कोवे ने काटा".

अब ऐसे में जब चैनल मक्खनबाजी में ही जुटा है...तो फिर आम जानता की बात कौन करेगा...भोपाल का भी एक चैनल है...जिसमे साफ़ तौर पर निर्देश दिया गया है..कि मुख्यमंत्री के खिलाफ कुछ नहीं बोलना है...ऐसी ख़बरें चलाना साफ़ तौर पर प्रतिबंधित की गई है....पता नहीं कहाँ ले जाएगी हमें ये बे सर पैर की पत्रकारिता.....चिंतन और मनन...मै आप लोगों पर छोड़ता हूँ...

Tuesday, January 18, 2011

अबला नहीं भीष्मा कहिये.

नशाखोरी समाज में इतनी भीषण तरीके से अपनी जड़ें फैला चुका है...कि बरगद कि हर एक टहनी से निकलने वाली जड़ों कि संज्ञा इसको दें तो शायद काम होगी...सवाल समाज के लोगों का है...आपका है...हम सबका है....आखिर इस मौज भरी जिन्दगी में हमें किस बात का तनाव...जब रिश्ते नाते टूट रहे है...उनमे बिखराव हो रहा है..भाई भाई को कट रहा है...बेटा मां-बाप की हत्या कर रहा है....खबरिया चैनल मानव मूल्यों की हत्या करने में लगे है....किसी को किसी के बारे में सोचने का वक़्त नहीं है...तो तनाव क्यों...हम भी बेफिक्री में क्यों नहीं जीते...पर नहीं जी सकते है दोस्त....इन रगों में आवो हवा आज भी उस गाँव की मौजूद है...उस गाँव की नदी कुओं का पानी रक्त बनकर इस जिस्म में दौड़ रहा है....जो बिसलरी की बोतल से कहीं ज्यादा पवित्र और शुद्ध है....यदि ऐसा नहीं तो गंदगी बजबजायी गंगा को हम आज भी मैया क्यों कहते है...किसी भी सोच की शुरुवात गाँव से ही होती है...ऐसी ही शुरुवात नशाखोरी मुक्त समाज की हुई है सिवनी जिले के एक गाँव से.....जहाँ की औरतों ने निश्चय किया है की यदि उनके पतियों ने शराब पी तो वे उससे तलाक मांग लेगी...यही नहीं यदि गाँव में कोई शराब बेंचता या पीता पकड़ा जाता है तो उसे डेढ़ हजार रूपए का जुरमाना ग्राम पंचायत को देना होगा...इसके अलावा शराब पीने वाले की सूचना देने वाले को ग्राम पंचायत एक हजार रूपए का इनाम देगी...जिला मुख्यालय से करीब ३५ किमी.दूर आदिवासी बाहुल्य ढुतेरा गाँव की महिलाओं ने गाँव को नशामुक्त बनाने का संकल्प किया है...एक हजार चार सौ दस लोगो की आबादी वाले इस गाँव में आज से आठ साल पहले गाँव के युवकों की शराब पीने से मौत हो गई थी...मौत के बाद गाँव के लोगों ने बैठकर शराब न पीने और बेंचने का संकल्प लिया...तब पुरुषों ने कमान संभाली..अब महिलाये इसकी केंदीय भूमिका में है....इस नेक काम में कलाबाई ने सबसे पहले अपने शराबी पति से रिश्ता तोड़ दिया है......बड़ा ही दिलेरी का काम किया है कलावती ने....हर किसी में शायद कलावती जैसी हिम्मत नहीं होती...पर शायद जब संकल्प लिया है...तो रिश्ते नाते भी दूर होगे...शायद महाभारत के पात्र अम्बा को भी तो भीष्मा कह सकते है....मुझे महाभारत की एक पात्र अम्बा का नाम याद आ रहा है....जब देवव्रत भीष्म ने.उनका हरण किया....तो वे शादी के लिए तैयार नहीं थी...हस्तिनापुर से उनकी ससम्मान विदाई कर दी गई...लेकिन शाल्वराज ने उनको अपनी अर्धांगिनी बनाने से मन कर दिया....तब वो भीष्म से शादी के लिए तैयार तो हुई..पर भीष्म ने शादी न करने की प्रतिज्ञा की थी...अब सवाल था कैसे अम्बा का जीवन कटेगा...तब अम्बा ने जो प्राण किया था की भीष्म का संहार मै करुगी...और तपस्या करने लगी...और तभी कठिन साधना के कारण उनका नाम भीष्मा पड़ा.... इस गाँव की सभी भीष्माओं को मेरा सलाम

Saturday, January 8, 2011

आज भी याद है...

चार अक्षर पढने को मै आया शहर
गाँव हरपल मुझे याद आता रहा
साथ बैठे दोस्तों की वो अठखेलियाँ
वो बचपन की कृत्रिम बोलियाँ
वो बैठकर मंदिर पर बैठकर की गपवाजी कभी
लोट पोट हो जाते थे सुन कर सभी
वो मां का दुलार
वो पापा की लताड़
आज भी याद है...
वो खेतो पर जाकर मटर की फली
वो गाँव में पारो के घर की गली
चलने लगा जब घर से शहर के लिए
किसी ने मांगी दुआ,तो कोई बोला
चलो एक बला तो टली
पाकर शहर में दोस्तों का प्यार
वो मां का स्नेह वो दुलार
वो पिता की लताड़
सब कुछ मिला
मां देवकी और वसुदेव को छोड़ आया जो गाँव में
नन्द बाबा और मैया यशोदा का भी प्यार पाया
खुसनसीब हूँ कि इतना कृष्ण तो बन गया
बस अब एक कंस कि दरकार है...
सही मायने मै कृष्ण बन सकूँ.
बस यही एक चाह है....

Monday, January 3, 2011

नई सदी की ग़मगीन शाम..

नई सदी का नया सवेरा नया वर्ष,नया उत्साह,नया हर्ष,नई उम्मीदें,आशा की नई किरण....जो कल था वो आज नहीं रहा,और जो आज समय है वो कल नहीं रहेगा...वक़्त तो अपनी रफ़्तार से दौड़ता ही रहता है....लेकिन जो वक़्त कि रफ़्तार के साथ कदम मिला के चला,वही तो बनता है सिकंदर... लेकिन पत्रकारिता विश्वविध्यालय का एक योद्धा दौड़ने के पहले ही कदम ठिठका कर खड़ा हो गया....दोस्तों ने कहा..तुझे चलना होगा....तुझे पत्रकारिता जगत को नया आयाम देना है...तुझे बोलना होगा...उठाना होगा...मौत से जीतना होगा....लड़ना है जमाने से....देखो पूरा विश्वविद्यालय बुला रहा है तुम्हे...उठो मनेन्द्र....चलो....परिक्षये ख़त्म हुई....घर पर सब इंतजार कर रहे है.......जाने नहीं देंगे तुझे...जाने तुझे देंगे नहीं....मां ने ख़त में क्या लिखा था...जिए तू जुग-जुग ये कहा था....चार पल भी जी न पाया तू........लेकिन वो ऐसे नीद के आगोश में सोया की फिर उठ नहीं पाया......

अभी कल की ही तो बात है,जब मैंने नई सदी का नया सवेरा की मंगल कामना की थी....मगर अफ़सोस की पत्रकारिता विश्वविद्यालय से समय ने एक ऐसा योद्धा छीना....जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता....

भोपाल के रेडक्रास अस्‍पताल में इलाज के दौरान पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय के एक होनहार छात्र हम सबको छोड़कर चला गया. वह विज्ञान पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था. छात्र के सहपाठियों ने इलाज करने वाले डाक्‍टर पर गलत इंजेक्शन लगाने का आरोप लगाया है. डाक्‍टर उक्‍त छात्र की मौत हार्ट अटैक के चलते होने की आशंका जता रहे है. पुलिस ने छात्र के शव को पोस्‍टमार्टम के लिए हमीदिया अस्‍पताल भेज दिया है.

रचना नगर में रहने वाले छात्र मनेंद्र पांडेय (28 वर्ष) को अचानक सीने में दर्द हुआ. जिसके बाद उसे इलाज के लिए रेडक्रास अस्‍पताल में भर्ती कराया गया. दर्द तेज होने पर वहां मौजूद डाक्‍टर अजय सिंह ने उसे इंजेक्शन लगाया. इसके करीब पंद्रह-बीस मिनट बाद मनेंद्र की मौत हो गई. मनेंद्र को इसके पहले भी सीने में दर्द हुआ था. जिसे कम करने के लिए उसने दर्द निवारक दवाएं ली थी.

पता नहीं इस नई सदी के आगाज में हम लोगो से कहाँ गलती हुई कि हमारा एक मित्र ऐसे रूठा....कि पूरा विश्वविद्यालय उसके कदमो में बैठा है...पर वह अड़ियल है....किसी कि बात नहीं मान रहा है.....वो हमसे दूर जाने की ठान चुका है....देखो कैसे हाथ छुड़ा के भाग रहा है.....कोई रोको उसे...कोई तो मनाओ.....कोई तो होगा जिसकी बात माने.....एकलव्य जी आप ही समझाए......पी.पी.सर आप ही आदेश दो इसे...आपकी बात नहीं काटेगा....

लेकिन शायद पी.पी.सर में भी अब मनेन्द्र को आदेश देने की ताकत नहीं बची....सबके गले रुंधे है....सबको मनेन्द्र से विछोह का दुःख है.....लौट आओ मनेन्द्र ...जुबान पर यही लब्ज है.....लेकिन वो जा रहा है...हम सबको अकेला छोड़कर.....

लौट आओ मनेन्द्र....हम चाय पीने चलेगे.....

कृष्ण कुमार द्विवेदी

छात्र(मा.रा.प.विवि,भोपाल)