मै बचपन से ही विचारक प्रवृत्ति का रहा हूँ...लेकिन अभी तक कोई माध्यम नही मिला जिससे कि दिल कि आवाज़ को लोगों तक पंहुचा सकूँ !लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के बाद विचारो को अभिव्यक्त करने का जज्बा भड़क उठा और लोगों से जुड़ने का अच्छा माध्यम लगा ब्लॉग और बना लिया विचारो को लिखने का आशियाना...
Saturday, January 8, 2011
आज भी याद है...
Monday, January 3, 2011
नई सदी की ग़मगीन शाम..
नई सदी का नया सवेरा नया वर्ष,नया उत्साह,नया हर्ष,नई उम्मीदें,आशा की नई किरण....जो कल था वो आज नहीं रहा,और जो आज समय है वो कल नहीं रहेगा...वक़्त तो अपनी रफ़्तार से दौड़ता ही रहता है....लेकिन जो वक़्त कि रफ़्तार के साथ कदम मिला के चला,वही तो बनता है सिकंदर... लेकिन पत्रकारिता विश्वविध्यालय का एक योद्धा दौड़ने के पहले ही कदम ठिठका कर खड़ा हो गया....दोस्तों ने कहा..तुझे चलना होगा....तुझे पत्रकारिता जगत को नया आयाम देना है...तुझे बोलना होगा...उठाना होगा...मौत से जीतना होगा....लड़ना है जमाने से....देखो पूरा विश्वविद्यालय बुला रहा है तुम्हे...उठो मनेन्द्र....चलो....परिक्षये ख़त्म हुई....घर पर सब इंतजार कर रहे है.......जाने नहीं देंगे तुझे...जाने तुझे देंगे नहीं....मां ने ख़त में क्या लिखा था...जिए तू जुग-जुग ये कहा था....चार पल भी जी न पाया तू........लेकिन वो ऐसे नीद के आगोश में सोया की फिर उठ नहीं पाया......
अभी कल की ही तो बात है,जब मैंने नई सदी का नया सवेरा की मंगल कामना की थी....मगर अफ़सोस की पत्रकारिता विश्वविद्यालय से समय ने एक ऐसा योद्धा छीना....जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता....
भोपाल के रेडक्रास अस्पताल में इलाज के दौरान पत्रकारिता विश्वविद्यालय के एक होनहार छात्र हम सबको छोड़कर चला गया. वह विज्ञान पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था. छात्र के सहपाठियों ने इलाज करने वाले डाक्टर पर गलत इंजेक्शन लगाने का आरोप लगाया है. डाक्टर उक्त छात्र की मौत हार्ट अटैक के चलते होने की आशंका जता रहे है. पुलिस ने छात्र के शव को पोस्टमार्टम के लिए हमीदिया अस्पताल भेज दिया है.
रचना नगर में रहने वाले छात्र मनेंद्र पांडेय (28 वर्ष) को अचानक सीने में दर्द हुआ. जिसके बाद उसे इलाज के लिए रेडक्रास अस्पताल में भर्ती कराया गया. दर्द तेज होने पर वहां मौजूद डाक्टर अजय सिंह ने उसे इंजेक्शन लगाया. इसके करीब पंद्रह-बीस मिनट बाद मनेंद्र की मौत हो गई. मनेंद्र को इसके पहले भी सीने में दर्द हुआ था. जिसे कम करने के लिए उसने दर्द निवारक दवाएं ली थी.
पता नहीं इस नई सदी के आगाज में हम लोगो से कहाँ गलती हुई कि हमारा एक मित्र ऐसे रूठा....कि पूरा विश्वविद्यालय उसके कदमो में बैठा है...पर वह अड़ियल है....किसी कि बात नहीं मान रहा है.....वो हमसे दूर जाने की ठान चुका है....देखो कैसे हाथ छुड़ा के भाग रहा है.....कोई रोको उसे...कोई तो मनाओ.....कोई तो होगा जिसकी बात माने.....एकलव्य जी आप ही समझाए......पी.पी.सर आप ही आदेश दो इसे...आपकी बात नहीं काटेगा....
लेकिन शायद पी.पी.सर में भी अब मनेन्द्र को आदेश देने की ताकत नहीं बची....सबके गले रुंधे है....सबको मनेन्द्र से विछोह का दुःख है.....लौट आओ मनेन्द्र ...जुबान पर यही लब्ज है.....लेकिन वो जा रहा है...हम सबको अकेला छोड़कर.....
लौट आओ मनेन्द्र....हम चाय पीने चलेगे.....
कृष्ण कुमार द्विवेदी
छात्र(मा.रा.प.विवि,भोपाल)Sunday, January 2, 2011
नई सदी का नया सवेरा
पुराना साल,हर साल की तरह कुछ खट्टी मीठी यादें छोड़ गया...कुछ अनसुलझे सवाल,गुत्थियाँ भी...जिनको हम आगे आने वाले समय में विचार कर सकें,और सही डगर पर चल सकें.....इस साल की शुरुआत के साथ एक ख़ुशी और...की इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक की शुरुवात भी हो गई.....जैसा पहला दशक निकला समाज में कुछ विसंगतियों के साथ,कुछ नए अनुभवों के साथ गुजरा....इस दशक की एक अनसुलझी गुत्थी आरुशी हत्याकांड...जिसमे सी.बी.आई. ने भी हाथ खड़े कर दिए...इसे अपराधी की शातिरता कहें या सी.बी.आई. की नाकामी...खैर...एक उम्मीद कि ये नया दशक भी कुछ उसी तरह या उससे बेहतर साबित हो.....
मुझे याद है कि जिस समय इक्कीसवीं सदी के पहले दशक कि शुरुआत होने वाली थी,उस समय मै कक्षा सात में पढने वाला गाँव का एक भोला सा आम लड़का था...जिसकी न एक अलग सोच थी...न विचार...हाँ...नए साल से एक उम्मीद जरूर थी...कि शायद दुनिया ख़त्म नहीं होगी...क्यों कि उस समय भी ये अफवाह जोरों से चल रही थी कि १ जनवरी २००० को दुनिया ख़त्म हो जायेगी....लेकिन तर्क किसी के पास नहीं था......लेकिन समय गया...गुजरा ...दुनिया आज भी कायम है....समय आज भी अपनी गति से चलायमान है....लेकिन अब २०१२ का भी दर लोगों के ज़ेहन में है.....लेकिन हम भारतीय भी आशावादी है....हम जीतेगे....क्यों कि हम सबमे परिस्थितियों से जूझने का जज्बा है...एक दशक के बाद आज मै एक ऐसे समाज का हिस्सा बन गया हूँ...जिसे अपने अलावा समाज के हर वर्ग के बारे विचार करना पड़ता है...अपने आप में एक सुखद एहसास...हर हिन्दुस्तानी की तरह मुझे भी नए साल से ढेरों उम्मीदें है....
१-क्रिकेट का वर्ल्ड कप इस बार भारत में आएगा.
२-भारत विश्व की एक महाशक्ति के रूप में उभरेगा.
३-संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता मिल जायेगी.
४-युवाशक्ति अपने होने का एहसास राजनीति में जरूर कराएगी.
५-साहित्य लेखन बढेगा.
६-पत्रकारिता के वेद व्यासों,और नारदों को सद्बुद्धि आएगी.
७-हर गरीब को रोजगार मिलेगा
8-हर बच्चे को पढने का अधिकार मिलेगा.
9-चिकित्सा के क्षेत्र में विकास होगा.
१०-हम आर्थिक रूप से भी मजबूत होंगे.
इन्ही अपेक्षाओं और उम्मीदों के साथ हम होंगे कामयाब की भावना के साथ सभी लोगों को
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं'
Sunday, November 28, 2010
पत्रकारिता कॉलेज पी गया छात्रों का पैसा


कों खां क्या चल रिया हेगा?केन लगे,कन्ने कट गए,सर पर दे रिया हे मिला मिला के......झीलों की नगरी भोपाल का अपना एक खास अंदाज है .भोपाल शहर अपनी खूबसूरती के लिए पूरे देश में जाना जाता है.साथ ही पत्रकारों की उद्गम स्थली अगर भोपाल को कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.भोपाल में समय के साथ बहुत तरक्की हुई.....मध्य प्रदेश में इसे एजूकेशन हब की उपाधि मिली...तो कई प्राईवेट समूहों ने यहाँ अपना वर्चस्व कायम किया.....ऐसा ही अपनी एक अलग सल्तनत बनाये हुए पीपुल्स समूह...जो कि स्वास्थ्य,शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर कदम बढ़ा रहा है ...मीडिया के बढ़ते ग्लैमर को देखते हुए पीपुल्स समूह ने २००७ में पीपुल्स पत्रकारिता शिक्षण संस्थान के नाम से एक पत्रकारिता महाविद्यालय की शुरुआत की.मध्य प्रदेश की पत्रकारिता से जुड़े कई नामचीन चेहरे इससे जुड़े.लेकिन अंदरूनी कलह और कॉलेज की गन्दी राजनीति के चलते धीरे धीरे ये सब लोग यहाँ से खिसकते गए.समस्या कॉलेज में पढाई की थी,प्रयोगात्मक रूप से छात्रों को सक्षम बनाने की थी.२००७ से करीब डेढ़ साल तक महाविद्यालय को सुचारू रूप से चलने का श्रेय तात्कालीन प्राचार्य विनोद तिवारी को जाता है.ये उनका व्यक्तित्व था कि वे व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर या प्रबंधन स्तर पर छात्रों की हर समस्या को सुलझा लेते थे.लेकिन विनोद तिवारी के जाने के बाद कॉलेज की स्थिति 'धोबी के कुत्ते' की तरह हो गई.न अब वह घर का रहा और न घाट का......बी.एन.गोस्वामी,पंकज पाठक,संदीप श्रीवास्तव ...एक एक कर सबने प्राचार्य का पद संभाला...लेकिन फिर कॉलेज का अंतर्कलह...और फिर शुरू हुआ इस्तीफों का दौर...
अंत में समूह की प्रबंधन टीम का हिस्सा आस्मां रिजवान को कॉलेज के प्राचार्य का पदभार सौंपा गया ...अभी तक आस्मां रिजवान,पीपुल्स समूह के मैनेजमेंट कॉलेज में व्याख्याता के तौर पर पढ़ाती थी.ऐसे में जब बागडोर आस्मां रिजवान ने संभाली तो पत्रकारिता के कॉलेज को उन्होंने मैनेजमेंट कॉलेज की लाठी से हांकना शुरू कर दिया..शायद पत्रकारिता कॉलेज चलने का अनुभव उनमें नहीं था.वे शायद भूल गईं थी कि उन्हें लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की उद्गम स्थली को क्रियान्वित करना है...हर छात्र कल का लोकतंत्र की आवाज है.अपनी तानाशाही आदत से मजबूर आस्मां रिजवान ने पहले तो सत्र के बीच में ही महाविद्यालय की फीस में इजाफा कर दिया...जबकि विवरण पुस्तिका में ऐसा कुछ भी उल्लिखित नहीं था..छात्रों को को प्रवेश के समय पूरी फीस के बारे बता दिया गया था....यदि उन छात्रों को बीच सत्र में फीस बढ़ने की बात पता होती तो शायद कई छात्र यहाँ पर प्रवेश नहीं लेते...लेकिन एक साल की पढाई के बाद अचानक फीस में हुई बढ़ोत्तरी को छात्रों ने अपने भविष्य को देखकर स्वीकार कर लिया........२००७-१० के बीच बी.एस.सी.(ई.एम् )करने वाले छात्रों का कोर्स जून २०१० में समाप्त हो गया....छात्रों ने जब विद्यालय में जमा अपनी कोशन मनी की मांग की...तो महाविद्यालय प्रबंधन की और से उन्हें झुनझुना पकड़ा दिया गया.....जबकि महाविद्यालय में प्रवेश के समय छात्रों को जो विवरण पुस्तिका मिली थी उसमे साफ़ तौर पर महावि.कोशन मनी,पुस्तकालय कोशन मनी का जिक्र किया गया है ....
यशवंत जी कोशन मनी का मतलब पैसों की पुनर्वापसी होता है....लेकिन महाविद्यालय प्रबंधन ने छात्रों को ५०० दुपाये देकर चलता कर दिया....बस अपनी प्रबंधकीय आवाज़ से छात्रों की आवाज़ को दबाने की कोशिश की जा रही है...................बस तानाशाही रवैये से चल रहा है कॉलेज ....
-कृष्ण कुमार द्विवेदी
Saturday, October 30, 2010
रणभूमि बने गाँव
कृष्ण कुमार द्विवेदी
छात्र (मा.रा.प.विवि,भोपाल )
Monday, October 25, 2010
अब पत्रकार नहीं बनूगा...
एक वक़्त जब हम पर चढ़ा था बुखार,बनूगा पत्रकार
जन आशीष की चाह थी,चाह थी तो राह थी
एक दिन हश्र देखा,जब कलम की ताक़त का
हुआ अहसास वक़्त की नजाकत का
देश के बड़े पत्रकार और यूपी की माया
कलम को पुलिस के आगे लाचार पाया
पुलिस को शांति भंग की थी आशंका
डर था कहीं हनुमान जला न दे लंका
बस पत्रकार की मां को बिठा दिया थाने में
(करतूत उनकी थी)जो बिकते है रुपये आठ आने में
पत्रकार बेटे ने दिया घर की इज्ज़त का हवाल
पुलिस ने भी किये उससे सवाल दर सवाल
बेटे ने जब पुलिस को कानून का पाठ पढाया
लेकिन कानून भी सत्ता के आगे मजबूर नज़र आया
१८ घंटे बाद बमुश्किल,बेटा मां को आज़ाद करा पाया
धन्य है प्रशासन,धन्य है माया की माया
मां की आँखों का हर आंसू एक कहानी था
जेल में बीता हर पल एक लम्बी जिंदगानी था
देश की शसक्त महिलाए भी बेजुबान हो गई
या फिर माया बदगुमान हो गई
मै देखकर ये सब परेशां हो गया
बक बक करने वाला युवा बेजुबान हो गया
इस पूरी घटना में प्रशासन की तानाशाही थी
मां की आँखों में हर पल,बस सत्ता की तवाही थी
-कृष्ण कुमार द्विवेदी
Wednesday, September 29, 2010
विवादित भूमि

आखिर विबाद है क्या यह शायद आमजनता को पता नहीं विवाद असली मुद्दा है आस्था का जुड़ा होना। हिंदू अयोध्या को अपने आराध्य भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं और विवादित भूमि को रामजन्म भूमि कहते हैं, और मुस्लिम समुदाय का मानना है कि १५२७ में बाबर जब भारत आया और एक साल बाद यानि १५२८ मैं उसके सेनापति मीर बाकी ने उसके नाम से यहां मस्जिद बनाई। जबकि हिंदू कहते हैं कि यह मस्जिद मंदिर को तोड़ कर बनाई गई है। इसी विवाद के कारण पहली बार १८५९ सांप्रदायिक दंगे हुए थे। तब देश मैं अंग्रेजों का शासन था तो अंग्रेजी शासकों ने विवादित ज़मीन पर फैसला किया कि भीतर मुसलमानों को और हिंदुओं बाहर पूजा करने की इजाज़त है। साथ ही जाँच के आदेश कर दिए.विवादित ज़मीन पर जाँच के बाद १९४९ मैं मूर्तियाँ मिली। इस पर मुस्लिम समुदाय ने खुलकर विरोध प्रकट किया अतः मामला अदालत में चला गया और सरकार ने जगह को विवादित घोषित कर परिसर में ताला लगवा दिया। अभी इस मुकदमे में चार मुख्य दावेदार हैं। १. स्वर्गीय गोपाल सिंह विशारद,१९५०में अदालत में अर्जी दाखिल कर पूजा करने इजाज़त मांगी थी। १९५० में ही उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अदालत में मूर्ति हटाने की याचिका डाली, लेकिन अदालत ने मूर्ति हटाने से इंकार करते हुए पूजा जारी रखने का आदेश दिया। २. निर्मोही अखाड़ा, जिसने १९५९ में विवादित जमीन पर मालिकाना हक़ को लेकर अर्ज़ी दी। ३. सुन्नी वक्फ़ बोर्ड, जिसने १९६१ में मस्जिद पर मालिकाना हक़ को लेकर एक अर्ज़ी दाख़िल की। ४. राम जन्मभूमि न्यास, जिसने १९८९ में विवादित ज़मीन पर क़ब्जे़ के लिए अर्ज़ी डाली।विवादित ज़मीन पर मालिकाना हक़ को लेकर चारों अर्ज़ियां फ़ैजाबाद अदालत में १९८९ तक लंबित रहीं, जिन्हें बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट के विशेष बेंच को भेज दिया गया।२००३ में अदालत के आदेश पर पुरातत्व विभाग ने विवादित ज़मीन की खुदाई की और मंदिर के अवशेष पाए जाने की रिपोर्ट दी।
इसी मामले में अदालत का फ़ैसला आने वाला है, लेकिन ६० साल से ज़्यादा पुराने इस विवाद का अंत यहां पर भी नहीं है। क्योंकि फ़ैसला चाहे जिसके भी पक्ष में आए, इतना तय है कि दूसरा पक्ष सुप्रीम कोर्ट ज़रूर जाएगा।देश के बेहद पुराने और सबसे मुश्किल मामलों में से एक अयोध्या विवाद में मालिकाना हक़ की जंग भले ही सिर्फ़ चार पक्षकारों के बीच हो, लेकिन अदालत के बाहर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े दूसरे संगठनों की भूमिका भी कम अहम नहीं है। आस्था का सवाल उठाकर संघ ने उन्नीस सौ वानवे में राम जन्मभूमि विवाद को आंदोलन की शक्ल दी। हालांकि इस बार वह ज़्यादा सजग है। इस बार संघ पहले की तरह आंदोलन करने के बजाए जनजागरण की रणनीति पर चल रहा है और इसकी कमान उसने बीजेपी के बजाए संतों और वीएचपी के हाथ में दे रखी है। जनजागरण का यह अभियान क़रीब डेढ़ साल पहले गोरक्षा आंदोलन से शुरू हुआ और इस वक़्त हनुमतशक्ति जागरण के रूप में जारी है। इसी रणनीति के तहत संघ ने जहां अपने अनुषांगिक संगठनों को क़ानून के दायरे में रहने की हिदायत दी है, वहीं राम मंदिर को संसद में क़ानून लाकर बनाने की मांग भी की है।
विवाद के दूसरे पक्ष यानी बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के तेवर भी पहले जैसे ही हैं। बातचीत के ज़रिए समाधान से अब तक इंकार करती आई बीएमएसी की निगाह अब फ़ैसले पर टिकी है। उसने साफ़ कर दिया है कि अगर फ़ैसला रास नहीं आया, तो वे सुप्रीम कोर्ट का रुख़ करेगी। हालांकि उसने भी अपने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। ज़ाहिर है दोनों पक्षों को पता है कि फ़ैसला चाहे जो भी आए, मामला सुप्रीम कोर्ट में ज़रूर जाएगा। लेकिन अच्छी बात ये है कि दोनों को मामले की संवेदनशीलता का अहसास है और दोनों ही अमन-चैन बनाए रखने की बात कर रहे हैं।
अदालत में २० मुद्दे शामिल है, जिन्हें इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने फ़्रेम किया है-
१ .क्या ढहा दिया गया ढांचा, मस्जिद था?
२ .ढांचे को कब और किसने बनवाया था?
३.क्या इसे एक हिन्दू मंदिर को ध्वस्त कर के बनवाया गया था?
४. क्या मुसलमान, बाबरी मस्जिद में अनंतकाल से इबादत करते आए थे?
५. क्या १५२८ से मुसलमानों ने इसे अपने क़ब्ज़े में रखा था?
६. क्या मुसलमानों ने १९४९ तक इसे अपने क़ब्ज़े में रखा था?
७.क्या इस पर केस बहुत देर से दायर हुआ?
८.क्या लगातार पूजा के ज़रिए हिन्दुओं ने अधिकार हासिल कर लिया?
९.क्या भूखंड राम का जन्मस्थान है?
१०.क्या हिन्दुओं ने अनंतकाल से वहां राम जन्मस्थान के रूप में पूजा की है?
११.क्या मूर्तियां ढांचे के अंदर २२/२३ दिसंबर, १९४९ की रात को रखी गईं, या पहले से थीं?
१२.क्या ढांचे से लगा चबूतरा, भंडार और सीता रसोई; ढांचे के साथ ढहा दिया गया?
१३.क्या ढांचे से लगे भूखंड पर एक पुरानी कब्रगाह और एक मस्जिद थी?
14क्या ढांचा पूजा स्थलों से घिरा हुआ है, जिसे पार किए बिना ढांचे तक नहीं पहुंचा जा सकता?
१५.क्या इस्लाम के मुताबिक उस भूखंड पर मस्जिद नहीं बनाई जा सकती, जहां मूर्तियां रख दी गई हों?
१६.क्या ढांचा क़ानूनी रूप से मस्जिद नहीं हो सकती, क्योंकि उसमें मीनारे नहीं थीं?
१७.क्या यह ढांचा एक मस्जिद नहीं हो सकती, क्योंकि यह तीन ओर से कब्रगाह से घिरा था?
१८.क्या ढांचे के विध्वंस के बाद इसे अभी भी मस्जिद कहा जा सकता है?
१९.क्या ढांचे को ढहा दिये जाने के बाद मुसलमान खुली जगह में नमाज़ पढ़ सकते हैं?
२०.क्या वादी मुस्लिम संगठन; राहत पाने का हकदार है और अगर हां तो क्यों?
फ़ैसले पर राजनीतिक समीकरणः केंद्र और राज्यों की सरकारें तो फ़ैसले को लेकर क़ानून-व्यवस्था के सवाल पर चौकस दिख रही हैं, लेकिन उन सरकारों में काबिज़ सियासी दलों का व्यवहार कितना ज़िम्मेदारी भरा होगा, यह कहना मुश्किल है। केंद्र में यूपीए के भीतर और बाहर फ़ैसले के बाद के असर की अगुआई करने की तगड़ी जंग छिड़ सकती है। वैसे यूपीए को बाहर से समर्थन देने वाले लालू-पासवान की जोड़ी ने बिहार चुनाव के पहले ही कांग्रेस से कन्नी काट ली है और उसकी आगे की रणनीति में अदालत के फैसले की अहम भूमिका होगी। दरअसल, आडवाणी की रथ यात्रा को बिहार में रोक एमवाई समीकरण को पुख़्ता करने वाले लालू ने पंद्रह साल तक बिहार पर राज किया। लेकिन अब वे सियासी वजूद की लड़ाई लड़ने पर मजबूर हैं। नीतीश कुमार ने लालू के जातीय समीरण पर आर्थिक छुरी चला दी है, ऐसे में अयोध्या पर फ़ैसले के बाद लालू अपने पुराने तेवर में लौट सकते हैं। दूसरी तरफ़ कांग्रेस को भी अल्पसंख्यक वोट वापस चाहिए, लेकिन गुड़ खाने और गुलगुले से परहेज करने की तर्ज़ पर उसकी दुविधा यह है कि वह बहुसंख्यकों को भी नाराज़ नहीं करना चाहती। लिहाज़ा हाईकोर्ट के फ़ैसले पर रज़ामंदी नहीं बनने की सूरत में वो दोनों ही पक्षों को सुप्रीम कोर्ट जाने के विकल्प के खुले होने की याद दिला रही है।
उधर वामपंथी खेमा टीएमसी की ममता बनर्जी से अपने ही गढ़ में मात खा रहा है। ऐसे में फ़ैसले के बाद यूपीए के दलों में मचने वाली खलबली से फ़ायदा उठाने का मौक़ा वह भी नहीं चूकना चाहेंगे। लब्बोलुआब यह है कि जल्द ही इन दलों के बीच सबसे बड़े सेक्युलर की रेस शुरू होने वाली है।
संतोष सिकरवार (ब्यूरो चीफ,भोपाल )
अयोध्या का मसला किसी के लिए आस्था का है, तो किसी के लिए सियासत का, तो किसी के लिए सम्मान का। संघ परिवार तो जैसे आस्था, सियासत और सम्मान के इसी त्रिशूल पर टंग गया है। अयोध्या का मुद्दा न उसे निगलते बन रहा है, न उगलते। संघ का सियासी संगठन बीजेपी इसे लेकर दुविधा में है तो धार्मिक संगठन वीएचपी के लिए यह जीवन-मरण का सवाल बन गया है। इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ने वाला और ख़ुद को सामाजिक संगठन बताने वाला आरएसएस भी इसे लेकर सारे पत्ते खोलने से डर रहा है। हालांकि पक्ष और विपक्ष- दोनों ही तरह के फ़ैसलों की सूरत में जन आंदोलन खड़ा करने की उसकी पूरी तैयारी है। लेकिन यह तैयारी धरी की धरी रह जाएगी अगर जनता ने चुप्पी साध ली। ज़ाहिर है यह उसके विचार धारा के मूल को ख़ारिज़ करने जैसा होगा, फिर संघ क्या करेगा। इसीलिए संघ ने जम्मू कश्मीर के मसले पर आंदोलन करने की वैकल्पिक योजना भी बनाई है।
साफ़ है कि अयोध्या मुद्दे पर संघ अब खुलकर तभी आएगा, जब उसे लगेगा कि इस मामले में अब भी जनता की दिलचस्पी बची हुई है और राम मंदिर की ख्वाहिश लोगों के मन में आज भी उसी तरह ज़िंदा है, जैसे नब्बे के दशक में ज़िंदा थी। कमोबेश ऐसे ही मनःस्थिति उस दूसरे खेमे की भी है, जो अब तक मस्जिद की पैरोकारी करते रहे हैं। यानी अदालत का फ़ैसला चाहे जो भी हो, असली फ़ैसला देश की जनता को करना है कि वे अब भी मंदिर-मस्जिद में ही उलझे रहेंगे या फिर देश को सुपर पावर बनाने के सपने को पूरा करने के लिए क़दम से क़दम मिलाकर आगे बढ़ चलेंगे।