Tuesday, February 23, 2010

२४ घंटे न्यूज़ चैनल के उद्भव के समय समाचार पत्र के बारे में तरह तरह के कयास लगाये गए कि समाचार पत्र अब जल्द ही पुराने ज़माने की पुरानी चीजे हो जायेगें,लेकिन इस बदलते परिवेश में भी समाचार पत्रों ने अपने अस्तित्व को बनाये रखा,नए नए आयामों को तय किया .......लेकिन शायद अब ये समाचार पत्र राजधानी के एक पत्रकारिता के शिक्षण संसथान में गुजरे ज़माने की पुरानी चीजे होने वाले है....विद्ध्यालय प्रबंधन के लिए ये अब पुराने सिक्कों से ज्यादा कुछ नहीं है.......पंजाब केसरी की सम्पादकीय जहाँ युवाओं में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की अलख जगाया करता है......तो जनसता के व्यंगात्मक लेख अपने आप में विशिष्ट है.....
सीधे तौर पर कहा जाये तो पत्रकारिता का ककहरा सीखने वाले छात्रो के लिए तो ये संजीवनी से कम नहीं....लेकिन पीपुल्स पत्रकारिता शिक्षण संसथान के छात्रों को अब ये समाचार पत्र पढने को नहीं मिलेगे......
विद्यालय प्रबंधन के एक निर्णय के अनुसार और मिली सुचना के अनुसार कॉलेज के लायब्रेरी में सारी मेग्जींस और राष्ट्रिय समाचार पत्र अब उपलब्ध नहीं हो पायेगे.....
लायब्रेरी में अब केवल दैनिक भास्कर,राज एक्सप्रेस,पत्रिका,और ग्रुप का पीपुल्स समाचार ही उपलब्ध रहेगा|
पता नहीं पत्रकारिता के इस संसथान में पत्रकारों के लिए इतनी मुट्ठी तंग क्यों की जा रही है......बदलते परिवेश और पत्रकारिता में हो रहे बदलावों से भावी पत्रकार कैसे रु ब रु हो पायेगे...
कॉलेज में न्यूज़ चैनल देखने के लिए और उसकी बारीकियों को सीखने के लिए कोमन रूम की व्यवस्था पहले से ही नहीं है...और अब समाचार पत्रों के बंद होने से पत्रकारिता के छात्र अपनी जिज्ञासा की प्यास कैसे बुझा पायेगे....
पत्रकारिता के छात्रों के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लग जायेगा....कैसी होगी इस कॉलेज की नई पौध ....ये तो कुछ कहा नहीं जा सकता...लेकिन ये बात बिलकुल तय है..कि मानव मूल्यों के सरोकार की पत्रकारिता को कर पायेगे ये छात्र.....इस संस्थान का तो भगवान ही मालिक है......
सभी छात्रों को उज्जवल भविष्य की शुभकामनाये.....

Monday, January 11, 2010

मेरा नज़रिया: नया साल,बढ़ते कदम

मेरा नज़रिया: नया साल,बढ़ते कदम

नया साल,बढ़ते कदम


नया साल,नई सौगातें,नया जोश और जज़्बा हर भारतीय की एक ख्वाहिश कि हमारा देश दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्की करे॥ भारतीय बाजार पटरी पर लौट रहा है मंडियां फिर से अपनी मुस्कान बिखेरने को तैयार और सेंसेक्स उचाइयों कि नई बुलंदियों को छूने की कोशिश कर रहा है....मतलब बड़ा साफ़ है नया साल नई खुशियाँ लेकर आया...लेकिन नहीं बदले तो नेताओं के चरित्र,साल की शुरुआत के साथ ही संवेदनहीनता की कई घटनाये..तमिलनाडु की एक घटना एक पुलिसकर्मी को हमला कर घायल कर दिया गया वह बेचारा लोगों से मदद की गुहार लगता रहा...मंत्री जी का काफिला वहीँ से गुजरा लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की....
एक दूसरी घटना...सतना में एक जिन्दा बच्चे को डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया..क्यों की डॉक्टर को जाने की जल्दी थी.....और किसी ने इस मामले को कवरेज नहीं दिया समय बदला,विकास हुआ...साथ में मर गई संवेदनशीलता.....
इसी तरह की जिन घटनाओं को तबज्जो नहीं दी जाती...हमारा प्रयास कि ऐसी घटनायों को उजागर करे....और इसी की एक कोशिश....हम सब मित्रों के सहयोग से जल्द ही भोपाल से एक मैगजीन का प्रकाशन...जो राजनैतिक मुद्दों पर आधारित होगी.....नाम होगा खबरमाला.....खबरों को एक माला में पिरोने का प्रयत्न..हमारा ध्येय खबर बनाना नहीं...ख़बरों को उजागर करना है....कोशिश पत्रकारिता के माप दंडों पर चलते हुए मानव मूल्यों की रक्षा की जा सके...
इस मैगजीन के सभी कार्यकर्ता नए हैं,नया जोश है......इसलिए कुछ नया करने की चाहत थी....सो बिना किसी दवाव के मानवीय पक्षों और उनकी आवाज को उठाया जा सके......
श्री प्रदीप तिवारी जी प्रधान सम्पादक का दायित्व निभा रहे है.......मेरे मित्र श्री राजा नगायच प्रबंध संपादक ही भूमिका में....और अजय चौहान मुख्या कार्य पालक संपादक की जिम्मेदारी निभा रहे है....
जल्द ही ये पत्रिका आप लोगो के हाथ में होगी...नए साल में हम लोगों के बढ़ते कदम ....बिना किसी दवाब के मानव मूल्यों की पत्रकारिता की कोशिश.....कैसा है हम लोगों का प्रयास ....क्या कमी रही पत्रिका में.......क्या हम अपनी पत्रिका में नया कर सकते है.....बस आपका प्यार और स्नेह चाहिए........
आपके प्यार के लिए अपेक्षित
कृष्ण कुमार द्विवेदी

Friday, July 3, 2009

" समलैंगिक सम्बन्ध " जोर से बोलो करंट नहीं लगेगा


अब वो दिन दूर नहीं जब पप्पू संग दीपू और मीनू संग सीमा की बारात आप के घरों के बगल से गुजरेगी| भई पहले सुना था पप्पू पास हो गया है लेकिन अब तो दीपू, मीनू, सीमा सभी पास हो गए हैं| अब वो एक दुसरे को फ्लाइंग किस्स देंगे और पुलिस केवल मूकदर्शक बनी देखती रहेगी| भई! अब कौन धारा 14 और 21 का उल्लंघन करे| किसी के निजी कार्य में दखल देने का किसी को अधिकार नहीं है|
बदलते ज़माने के साथ-साथ प्यार की परिभाषा भी बदल रही है| जुहू चौपाटी, विक्टोरिया पार्क में अब दो लड़के और दो लडकियां (माफ़ कीजियेगा वयस्क) इश्क लड़ायेंगे| और उनके मुह से निकलेगा " समलैंगिक सम्बन्ध " जरा जोर से बोलो करंट नहीं लगेगा|

बहुत हो गयी मजाक और मस्ती...

आप और हम सभी जानते हैं कि भारत संस्कृति का देश है|लेकिन आज हमारे देश को क्या हो गया है? ऐसा लग रहा है कि पाश्चात्य संस्कृति के भी कान काट लिए गए हों| चौंकिए मत, ये समाज में चंद लोगों कि वजह से ही हुआ है| बहस का मुद्दा धारा 377| है भी बहस का विषय| 149 साल के लम्बे इतिहास में जो पहले नहीं हुआ वो 2 जून, 2009 को हो गया| समलैंगिक सम्बन्ध को क्लीन चिट दे दी गयी|
अप्राकृतिक! जिसकी भगवान ने भी मंजूरी नहीं दी किसी को| समाज आज जिस चीज को सही नहीं मानता, उसी को रजामंदी दे दी गयी| माना कि सभी को समान हक मिलना चाहिए| इसका मतलब यह तो नहीं कि जो अमानवीय कृत्य कि श्रेणी में आता है उसे नजरअंदाज कर दिया जाये| तो फिर ऐसा क्यों? यह समाज में रह रहे उन लोगों कि मानसिकताओं के साथ बलात्कार है जो कि समलैंगिक सम्बन्ध को सही नहीं मानते|

जरा सोचिये कि आने वाली पीढी पर इसका क्या असर पड़ेगा? कल तक जिस कार्य को अपराध माना जाता था, आज वो अपराध कि श्रेणी में नहीं है| शायद हम ये नहीं जानते कि ऐसे सम्बन्ध को रजामंदी देने से एड्स जैसे खतरनाक बिमारी को न्योता दे रहे हैं|

-अभिषेक राय

Tuesday, June 30, 2009

बेटी सदा ही परायी होती......


ऊपर वाले के खेल भी अजब निराले हैं!उसने जब कायनात बनाई होगी,तब एक एक मानव की जरूरत की चीजों पर गौर किया होगा जिससे वह इस मृत्युलोक में भी अपना जीवन आराम से व्यतीत कर सके!जब उसक लगा कि मनुष्य अपने आपको अकेला महसूस कर रहा है,तब उसने बेटी नाम की संरचना को गढ़ा होगा!खैर गढ़ने की जरूरत ही नहीं थी,मानव जैसे ही एक और अनमोल रचना,जिसमे भावनाए,ममता,प्यार को कूट कूट कर भर दिया!इस विनाशी संसार को आगे बढ़ाने के लिए आँचल दिया,जिसकी छाँव में पलकर और दूध पीकर चलना सीखा,और अपना विकास किया!
लेकिन हमने बेटी और बेटे में अंतर पैदा किया,क्यों?त्रेतायुग में सीता,गार्गी,सुलोचना जैसी बेटियाँ पैदा हुई,ये जब तक अपने पिता के पास रहीं एक बेटी का कर्त्तव्य निभाया,जब विवाह के बाद अपने पति के घर गईं तो पत्नीव्रत धर्मं भी निभाया!लेकिन बेटी को गैर समझा जाने लगा,क्यों?कहीं न कहीं इसके पीछे मानसिकता जरूर है कि बेटी को जन्म से ही पराया धन माना जाता है,और हम लोग पराये धन पर दांव नहीं लगाते!बेटी सबसे ज्यादा अपने पिता की लाडली होती है,और माँ उसकी सबसे अच्छी दोस्त!एक पिता अपने बेटों से ज्यादा बेटी को प्यार करता है!क्यों कि एक वैज्ञानिक सत्य है कि विपरीत लिंगों के मन में एक दुसरे के प्रति आकर्षण होता है,और निश्चित रूप से बाप-बेटी का रिश्ता उससे अछूता नहीं है!बेटी के बारे में कहा जाता है कि वह अपने ससुराल पक्ष की अपेक्षा मायके पक्ष के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती है,इससे सिद्ध होता है कि बेटों की अपेक्षा माँ-बाप की सेवा बड़ी ही तन्मयता के साथ करती है!पुरुष को भावनात्मक रूप से सबसे ज्यादा मजबूत माना जाता है,लेकिन बेटी की विदाई के समय उसकी यह मजबूती पता नहीं क्यों नहीं आ पाती,और फफक कर रो पड़ता है!दुनिया के दस्तूरों में बंधकर उसे अपनी २० सालों की अमूल्य निधि पराये हाथों में सौपना पड़ती है!
लेकिन वर्तमान परिदृश्य में बेटियों की संख्या में कमी आती जा रही है!बेटियों को पैदा होते ही मार दिया जाता है,या कोख में ही उनका दम घोंट दिया जाता है!ऐसा नहीं है कि इनका कत्ल होना कुछ नई बात हो!राजाओं-महाराजाओं के समय राजस्थान के राजा जन्म के समय ही बेटियों को मार डालते थे,क्यों कि उन्हें मुस्लिम शासकों के आक्रमण का डर लगा रहता था,जो उनकी बहू,बेटियों के साथ बड़ी ही पिशाचता के साथ पेश आते थे!वर्तमान दौर भी कुछ कम नहीं है,अब मुस्लिम शासकों के आक्रमण की जगह दहेज़ ने ले ली है!बेटियों की शादी के समय इतनी बड़ी रकम वरपक्ष को देनी पड़ती है,जितनी एक मजदूर वर्ग अपनी पूरी जिन्दगी में नहीं कमा पाता!और परिणाम, बेटियों की हत्या.....चाहे ससुराल पक्ष के द्वारा हो या फिर अपने पिता के हाथों,दोनों ही दशा में बेटी कि बलि ही चदायी जाती है!बुंदेलखंड में बेटियों को देवी के सदृश पूजा जाता है,यहाँ पर बेटियों के पैर छूने की प्रथा है,ऐसा शायद ही भारत के किसी हिस्से में होता हो,लेकिन भ्रूण हत्या के मामले में ये क्षेत्र भी पीछे नहीं है! कन्या भ्रूण हत्या के मामले इस कदर बढे है कि प्रति हजार पुरुषों पर केवल ९२७ महिलाये ही है! लेकिन बाप-बेटी के रिश्तों में भी दरार पड़ती नजर आ रही है,कभी बाप बेटी को अपनी हवस का शिकार बनाता है,तो कभी बेटी संपत्ति और कामुक्त प्रेम में अंधे होकर अपने बाप का कत्ल कर देती है!कुछ बाप बेटी के नाम जिन्होंने एक मिशल कायम की है....
जनक-सीता
जवाहर लाल नेहरू-इंदिरा गाँधी
जगजीवनराम-मीरा कुमार
रीता बहुगुणा जोशी-हेमवतीनंदन बहुगुणा
अम्बिका मिश्रा-सुनील मिश्रा(मेरी मित्र)
सवाल ये है-
१-कब तक बेटी पराया धन समझी जाती रहेगी?
२-कब तक बेटियों की यूँ ही हत्या की जाती रहेगी?
३-हवस के पुजारियों के चंगुल से कब आजाद होगी?
४-कब बेटी ब्याहकर ससुराल नहीं जायेगी बल्कि दूल्हा को ब्याहकर लाएगी?
अंत में कुछ पंक्तियाँ जो मेरे पिता जी अक्सर गुनगुनाया करते हैं-"ई संसारी में विधना ने,कैसी रीति बनाई
पाल-पोश के करो बडो सो,बिटिया भाई परायी

सुघरी स्यात भाई ती पैदा,बिटिया प्यारी-प्यारी
बारी उम्र अबै लाराकैयाँ,सुदी बहुत बिचारी
रही लाडली प्रानन प्यारी,नैन पुतरिया मोई
छाती से चिपका महतारी लओ,जबन्ही जा रोई
साजन साज बाराती आ गए द्वार बजी शहनाई
पाल-पोश के.........

Thursday, May 7, 2009


मानव जीवन संघर्षों से भरा है!हर सिक्के के दो पहलू होते है,और हर पहलू की बराबर प्रायिकता!आज दुःख है तो कल सुख भी आएगा,और आज सुख है कल दुःख भी आएगा!जो पत्ते पेड़ पर लगे हैं उन्हें जमीं पर गिरना ही है!बसंत में फिर से नई कोंपलें खिलती हैं,फिर पतझड़ में सरे पत्ते धरती चूम लेते हैं!जो फूल खिला है उसे मुरझाना ही है!लेकिन नई कलियाँ खिलती हैं तो जीवन में एक आस जगाती है!जीवन के बाद मृत्यु,और मृत्यु के बाद जीवन,एक नया जन्म!एक नया रूप,नया नाम,नया चेहरा!लेकिन इन सबसे जूझते हुए सभी एक नए जीवन के लिए संघर्ष करते है,बनाते है नई राहें!
भारतीय लोकतंत्र का घमासान अपने अंतिम पड़ाव में है!फैसला जनता तो कर चुकी है,लेकिन निर्णय १६ मई को!कई बाहुबली अपने बाहुबल के दम पर चुनाव में भाग्य आजमा रहे हैं!सभी दल ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने का दंभ भर रहे हैं!सभी प्रधानमंत्री बनने को आतुर,सभी की हार्दिक इच्छा!लेकिन कौन बनेगा प्रधानमंत्री?कौन पायेगा ये गद्दी?नतीजा १६ को स्पष्ट हो जायेगा!
खैर जो भी बने उसके सामने चुनौती की मंदी की मार से जूझते भारत को संपन्न राष्ट्रों में शुमार करना!देश के सारी परिस्थितियों से तालमेल बैठाकर देश को चलाना होगा!बनानी होगीं नई राहें!
देश में आर्थिक मंदी से कई युवा बेरोजगार हो चुके हैं,लेकिन दिल में एक आत्मविश्वास,सभी को नए आशियाने की तलाश,जो जल्द ही पूरी होगी क्यों कि वो बनाने को तत्पर हैं नई राहें!
हमारे कॉलेज का पहला बैच अपने कॉलेज जीवन से निकलकर पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण कर रहा है!सभी जोश से लबरेज,अटूट उत्साह,एक नई उमंग!कई छात्र पहले ही पदार्पण कर चुके हैं!जिनकी धमक से पूरा भोपाल और हिंदुस्तान गूंज रहा है!और बाकी भी अपनी चमक बिखेरने को व्याकुल है!सभी पाँचवे वेद की सेवा के लिए कमर कस चुके है!ये सभी नित नई-नई ऊचाइयों को छूकर अपने क़दमों को आगे बढाते रहें!संसार के तिमिर को चीरने वाले ज्ञान के दिव्य दीपक बनें!
कहते है "चिराग तले अँधेरा"
लेकिन ये सभी उस चिराग के नीचे के तम् को दूर करेंगे,ऐसी इनसे अपेक्षा!
खैर जीव में पाना और खोना तो लगा ही रहता है,लेकिन कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्त्तव्य पथ से न डिग कर मानव मात्र की सेवा करें!क्यों कि किसी ने कहा है
"कुछ खोना है कुछ पाना है
जीवन का खेल पुराना है
जब तक ये सांस चलेगी
यारा यूँ ही चलते जाना है"
सभी अपना प्रकाश पूरे हिन्दुस्तान में फैलाएं,इनकी प्रखर रश्मियों से सारा जग आलोकित हो,ऐसी हमारी आशा है!सभी पुरे संसार में बिखर जाएँ,ऐसा में इसलिए कह रहा हूँ क्यों कि मुझे महात्मा बुद्ध कि कहानी याद आ गयी!
"एक बार महात्मा बुद्ध एक गाँव में पहुचे!वहां के लोगों ने उनको गालियाँ दी,उनका अनादर किया!जाते समय भगवान् बुद्ध ने कहा-संगठित रहो!फिर दुसरे गाँव में पहुचे वहां के लोगों ने उनका आदर सत्कार किया,अच्छे लोग थे,रहने खाने की व्यवस्था की!चलते समय भगवान् ने कहा की पुरे विश्व में फ़ैल जाओ!यह सुनकर उनका एक शिष्य नाराज हो गया!भगवान् समझ गए!उन्होंने कहा कि एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है,मैंने ख़राब लोगों को इसलिए संगठित होने कहा जिससे दूसरे लोग उनसे प्रभावित न हो पायें और अच्छे लोगों को इसलिए बिखरने को कहा जिससे वे अपना प्रकाश सारे विश्व में फैला सकें!
यही मेरी हार्दिक इच्छा!
पत्रकारिता के क्षेत्र में पहला कदम रखने के लिए सभी लोगों को मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनायें!
खैर आप लोगों से बिछुड़ने का दुःख हमेशा महसूस होगा,क्यों कि आप हमारे सीनियर ही नहीं बड़े भाई भी हैं,लेकिन कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है!इसलिए बस अपनी क्षत्र छाया सदा बनायें रखे,और जीवन के हर कदम पर हिमालय के उतुंग शिखर की भांति उचाइयां तय करें!बनाये अपनी नई राहें ......
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ.............
-कृष्ण कुमार द्विवेदी

Tuesday, May 5, 2009

आईपीएल के जलवे



बंद आंखों से आस्था का चुनावी महापर्व अपने आखिरी पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। न जाने वर्ष 2009 में इस पर्व ने लोकतंत्र के कितने रंग दिखाए हैं। इन रंगों के छींटे केवल भारतीय नागरिकों पर ही नहीं ब्लकि विश्व भर के दुसरे देषों पर भी पड़े हैं। भारत एक विकासशील देशों में से एक है और विकास के नित नए आयाम भी पेश कर रहा है। लेकिन पालिटिक्स में अभी भी बौद्धिक विकास की जरूरत है। पहले तो नोटों के बंडल उछलाकर शर्मसार किया और फिर अब आईपीएल यानि इंडियन पाॅलिटिकल लीग जूते और चप्पलों की वजह से सूर्खियों में रहा। यूं कहें कि आज जनता ने अपने अभिव्यक्ति का माध्यम बदलकर जूते और चप्पल कर लिए हैं। संसद और विधानसभा में चप्पल और जूते का रिवाज तो है ही किंतु अब तो खुलेआम इसे भी लोकप्रियता मिल रही है।


लेकिन ये बेकसूर जनता ने ये कभी नहीं सोचा कि गिद्ध दृष्टि जमाए हुए इलेक्ट्राॅनिक मीडिया पल भर में सारी घटनाएं आॅन एयर कर देंगे। इनका क्या है भई। कुछ तो चटपटा होना चाहिए। ऐसा इसीलिए क्योंकि ये सारी घटनाएं विदेशी नागरिक भी देख रहे होते हैं, तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि देष के बाहर भारत की छवि कितनी धूमिल हो सकती है। खैर इन बातों को छोड़िए। अब मंच टूटने के साथ-साथ जुबान भी बेलगाम हो गए हैं। बिना सोचे समझे कुछ भी कह गुजरते हैं नेता। कोई किसी पर बुलडोजर चला देने की बात कर रहा है तो कोई किसी को जादू की झप्पी के साथ पप्पी देने की बात कर रहा है। इसलिए राजनीति को मजाक न समझें उसमें बौद्धिक्ता लाएं क्योंकि इत्तेफ़ाक से वो देश को चलाने में सहयोग कर रहें हैं।


दुःख की बात तो यह है कि समाज जिसको अपराधी मानता है आज उन्हीं गंुडे और मवालियों को लोकतंत्र का फायदा मिल जाता है। वर्तमान के परिदृष्य को देखते हुए लगता है कि क्या वाकई में आम जनता का वोट कीमती है या महज एक औपचारिकता।


आशा करता हूं कि 16 मई को सही निर्णय आए। अभिषेक राय